महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयमुना गङ्गया सार्धं संगता लोकपावनी । गङ्गायमुनयोर्मध्यं पृथिव्या जघनं स्मृतम् ॥ ७५ ॥ राजेन्द्र! तत्पश्चात् महर्षियोंद्वारा प्रशंसित प्रयागतीर्थमें जाय। जहाँ ब्रह्मा आदि देवता, दिशा, दिक्पाल, लोकपाल, साध्य, लोकसम्मानित पितर, सनत्कुमार आदि महर्षि, अंगिरा आदि निर्मल ब्रह्मर्षि, नाग, सुपर्ण, सिद्ध, सूर्य, नदी, समुद्र, गन्धर्व, अप्सरा तथा ब्रह्माजीसहित भगवान् विष्णु निवास करते हैं। वहाँ तीन अग्निकुण्ड हैं जिनके बीचसे सब तीर्थोंसे सम्पन्न गंगा वेगपूर्वक बहती हैं। त्रिभुवनविख्यात सूर्यपुत्री लोकपावनी यमुनादेवी वहाँ गंगाजीके साथ मिली हैं। गंगा और यमुनाका मध्यभाग पृथ्वीका जघन माना गया है ॥ ६९—७५ ॥ प्रयागं जघनस्थानमुपस्थमृषयो विदुः । प्रयागं सप्रतिष्ठानं कम्बलाश्वतरौ तथा ॥ ७६ ॥ तीर्थं भोगवती चैव वेदिरेषा प्रजापतेः । तत्र वेदाश्च यज्ञाश्च मूर्तिमन्तो युधिष्ठिर ॥ ७७ ॥ प्रजापतिमुपासन्ते ऋषयश्च तपोधनाः । यजन्ते क्रतुभिर्देवास्तथा चक्रधरा नृपाः ॥ ७८ ॥ ततः पुण्यतमं नाम त्रिषु लोकेषु भारत । प्रयागं सर्वतीर्थेभ्यः प्रवदन्त्यधिकं विभो ॥ ७९ ॥ गमनात् तस्य तीर्थस्य नामसंकीर्तनादपि । मृत्युकालभयाच्चापि नरः पापात् प्रमुच्यते ॥ ८० ॥ ऋषियोंने प्रयागको जघनस्थानीय उपस्थ बताया है। प्रतिष्ठानपुर (झूसी)-सहित प्रयाग, कम्बल और अश्वतर नाग तथा भोगवतीतीर्थ यह ब्रह्माजीकी वेदी है। युधिष्ठिर! उस तीर्थमें वेद और यज्ञ मूर्तिमान् होकर रहते हैं और प्रजापतिकी उपासना करते हैं। तपोधन ऋषि, देवता तथा चक्रधर नृपतिगण वहाँ यज्ञोंद्वारा भगवान्का यजन करते हैं। भरतनन्दन! इसीलिये तीनों लोकोंमें प्रयागको सब तीर्थोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ एवं पुण्यतम बताते हैं। उस तीर्थमें जानेसे अथवा उसका नाम लेनेमात्रसे भी मनुष्य मृत्युकालके भय और पापसे मुक्त हो जाता है ॥ ७६—८० ॥ तत्राभिषेकं यः कुर्यात् संगमे लोकविश्रुते । पुण्यं स फलमाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः ॥ ८१ ॥ वहाँके विश्वविख्यात संगममें जो स्नान करता है वह राजसूय और अश्वमेधयज्ञोंका पुण्यफल प्राप्त कर लेता है ॥ ८१ ॥ एषा यजनभूमिर्हि देवानाभिसंस्कृता । तत्र दत्तं सूक्ष्ममपि महद् भवति भारत ॥ ८२ ॥