भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 642

जैसे अग्नि ईंधनको जला देती है, उसी प्रकार सैकड़ों निषिद्ध कर्म करके भी यदि गंगास्नान किया जाय तो उसका जल उन सब पापोंको भस्म कर देता है। सत्ययुगमें सभी तीर्थ पुण्यदायक होते हैं। त्रेतामें पुष्करका महत्त्व है। द्वापरमें कुरुक्षेत्र विशेष पुण्यदायक है और कलियुगमें गंगाकी अधिक महिमा बतायी गयी है। पुष्करमें तप करे, महालयमें दान दे, मलय पर्वतमें अग्निपर आरूढ हो और भृगुतुंगमें उपवास करे ।। ८९-९१ ।।

पुष्करे तु कुरुक्षेत्रे गङ्गायां मध्यमेषु च । स्नात्वा तारयते जन्तुः सप्तसप्तावरांस्तथा ॥ ९२ ॥ पुष्कर, कुरुक्षेत्र, गंगा तथा प्रयाग आदि मध्यवर्ती तीर्थोंमें स्नान करके मनुष्य अपने आगे-पीछेकी सात-सात पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है ॥ ९२ ॥

पुनाति कीर्तिता पापं दृष्टा भद्रं प्रयच्छति । अवगाढा च पीता च पुनात्यासप्तमं कुलम् ॥ ९३ ॥ गंगाजीका नाम लिया जाय तो वह सारे पापोंको धो-बहाकर पवित्र कर देती है। दर्शन करनेपर कल्याण प्रदान करती है तथा स्नान और जलपान करनेपर वह मनुष्यकी सात पीढ़ियोंको पावन बना देती है ॥ ९३ ॥

यावदस्थि मनुष्यस्य गङ्गायाः स्पृशते जलम् । तावत् स पुरुषो राजन् स्वर्गलोके महीयते ॥ ९४ ॥ राजन्! मनुष्यकी हड्डी जबतक गंगाजलका स्पर्श करती है, तबतक वह पुरुष स्वर्गलोकमें पूजित होता है ॥ ९४ ॥

यथा पुण्यानि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च । उपास्य पुण्यं लब्ध्वा च भवत्यमरलोकभाक् ॥ ९५ ॥ जितने पुण्य तीर्थ हैं और जितने पुण्य मन्दिर हैं, उन सबकी उपासना (सेवन)-से पुण्यलाभ करके मनुष्य देवलोकका भागी होता है ॥ ९५ ॥

न गङ्गासदृशं तीर्थं न देवः केशवात् परः । ब्राह्मणेभ्यः परं नास्ति एवमाह पितामहः ॥ ९६ ॥ गंगाके समान कोई तीर्थ नहीं, भगवान् विष्णुसे बढ़कर कोई देवता नहीं और ब्राह्मणोंसे उत्तम कोई वर्ण नहीं है; ऐसा ब्रह्माजीका कथन है ॥ ९६ ॥

यत्र गङ्गा महाराज स देशस्तत् तपोवनम् । सिद्धिक्षेत्रं च तज्ज्ञेयं गङ्गातीरसमाश्रितम् ॥ ९७ ॥ महाराज! जहाँ गंगा बहती हैं वही उत्तम देश है; और वही तपोवन है। गंगाके तटवर्ती स्थानको सिद्धिक्षेत्र समझना चाहिये ॥ ९७ ॥

इदं सत्यं द्विजातीनां साधूनामात्मजस्य च । सुहृदां च जपेत् कर्णे शिष्यस्यानुगतस्य च ॥ ९८ ॥