भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 643

इस सत्य सिद्धान्तको ब्राह्मण आदि द्विजों, साधु पुरुषों, पुत्र, सुहृदों, शिष्यवर्ग तथा अपने अनुगत मनुष्योंके कानमें कहना चाहिये ॥ ९८ ॥ इदं धन्यमिदं मेध्यमिदं स्वर्ग्यमनुत्तमम् । इदं पुण्यमिदं रम्यं पावनं धर्म्यमुत्तमम् ॥ ९९ ॥ यह गंगा-माहात्म्य धन्य, पवित्र, स्वर्गप्रद और परम उत्तम है। यह पुण्यदायक, रमणीय, पावन, उत्तम, धर्मसंगत और श्रेष्ठ है ॥ ९९ ॥ महर्षीणामिदं गुह्यं सर्वपापप्रमोचनम् । अधीत्य द्विजमध्ये च निर्मलः स्वर्गमाप्नुयात् ॥ १०० ॥ यह महर्षियोंका गोपनीय रहस्य है। सब पापोंका नाश करनेवाला है। द्विजमण्डलीमें इस गंगा-माहात्म्यका पाठ करके मनुष्य निर्मल हो स्वर्गलोकमें पहुँच जाता है ॥ १०० ॥ श्रीमत् स्वर्ग्यं तथा पुण्यं सपत्नशमनं शिवम् । मेधाजननमन्यं वै तीर्थवंशानुकीर्तनम् ॥ १०१ ॥ यह तीर्थसमूहोंकी महिमाका वर्णन परम उत्तम, सम्पत्तिदायक, स्वर्गप्रद, पुण्यकारक, शत्रुओंका निवारण करनेवाला, कल्याणकारक तथा मेधाशक्तिको उत्पन्न करनेवाला है ॥ १०१ ॥ अपुत्रो लभते पुत्रमधनो धनमाप्नुयात् । महीं विजयते राजा वैश्यो धनमवाप्नुयात् ॥ १०२ ॥ इस तीर्थ-माहात्म्यका पाठ करनेसे पुत्रहीनको पुत्र प्राप्त होता है, धनहीनको धन मिलता है, राजा इस पृथ्वीपर विजय पाता है और वैश्यको व्यापारमें धन मिलता है ॥ १०२ ॥ शूद्रो यथेप्सितान् कामान् ब्राह्मणः पारगः पठन् । यश्चेदं शृणुयान्नित्यं तीर्थपुण्यं नरः शुचिः ॥ १०३ ॥ जातीः स स्मरते बह्वीर्नाकपृष्ठे च मोदते । गम्यान्यपि च तीर्थानि कीर्तितान्यगमानि च ॥ १०४ ॥ शूद्र मनोवांछित वस्तुएँ पाता है और ब्राह्मण इसका पाठ करे तो वह समस्त शास्त्रोंका पारंगत विद्वान होता है। जो मनुष्य तीर्थोंके इस पुण्य माहात्म्यको प्रतिदिन सुनता है वह पवित्र हो पहलेके अनेक जन्मोंकी बातें याद कर लेता है और देहत्यागके पश्चात् स्वर्गलोकमें आनन्दका अनुभव करता है। भीष्म! मैंने यहाँ गम्य और अगम्य सभी प्रकारके तीर्थोंका वर्णन किया है ॥ मनसा तानि गच्छेत सर्वतीर्थसमीक्षया । एतानि वसुभिः साध्यैरादित्यैर्मरुदश्विभिः ॥ १०५ ॥ ऋषिभिर्देवकल्पैश्च स्नातानि सुकृतैषिभिः । एवं त्वमपि कौरव्य विधिनानेन सुव्रत ॥ १०६ ॥