महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 644, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंव्रज तीर्थानि नियतः पुण्यं पुण्येन वर्धयन् । भावितैः करणैः पूर्वमास्तिकाच्छ्रुतिदर्शनात् ॥ १०७ ॥ प्राप्यन्ते तानि तीर्थानि सद्भिः शास्त्रानुदर्शिभिः । नाव्रती नाकृतात्मा च नाशुचिर्न च तस्करः ॥ १०८ ॥ स्नाति तीर्थेषु कौरव्य न च वक्रमतिर्नरः । त्वया तु सम्यग्वृत्तेन नित्यं धर्मार्थदर्शिना ॥ १०९ ॥ पिता पितामहश्चैव सर्वे च प्रपितामहाः । पितामहपुरोगाश्च देवाः सर्षिगणा नृप ॥ ११० ॥ तव धर्मेण धर्मज्ञ नित्यमेवाभितोषिताः । अवाप्स्यसि त्वं लोकान् वै वसूनां वासवोपम । कीर्तिं च महतीं भीष्म प्राप्स्यसे भुवि शाश्वतीम् ॥ १११ ॥
सम्पूर्ण तीर्थोंके दर्शनकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये मनुष्य जहाँ जाना सम्भव न हो उन अगम्य तीर्थोंमें मनसे यात्रा करे, अर्थात् मनसे उन तीर्थोंका चिन्तन करे। वसुगण, साध्यगण, आदित्यगण, मरुद्गण, दोनों अश्विनीकुमार तथा देवोपम महर्षियोंने भी पुण्य लाभकी इच्छासे उन तीर्थोंमें स्नान किया है। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले कुरुनन्दन! इसी प्रकार तुम भी विधिपूर्वक शौच-सन्तोषादि नियमोंका पालन करते और पुण्यसे पुण्यको बढ़ाते हुए उन तीर्थोंकी यात्रा करो। आस्तिकता और वेदोंके अनुशीलनसे पहले अपने इन्द्रियोंको पवित्र करके शास्त्रज्ञ साधु पुरुष ही उन तीर्थोंको प्राप्त करते हैं। कुरुनन्दन! जो ब्रह्मचर्य आदि व्रतोंका पालन नहीं करता, जिसने अपने चित्तको वशमें नहीं किया, जो अपवित्र आचार-विचारवाला और चोर है, जिसकी बुद्धि वक्र है, ऐसा मनुष्य श्रद्धा न होनेके कारण तीर्थोंमें स्नान नहीं करता। तुम धर्म और अर्थके ज्ञाता तथा नित्य सदाचारमें तत्पर रहनेवाले हो। धर्मज्ञ! तुमने पिता-पितामह-प्रपितामह, ब्रह्मा आदि देवता तथा महर्षिगण इन सबको सदा स्वधर्मपालनसे संतुष्ट किया है, अतः इन्द्रके समान तेजस्वी नरेश! तुम वसुओंके लोकमें जाओगे। भीष्म! तुम्हें इस पृथ्वीपर विशाल एवं अक्षय कीर्ति प्राप्त होगी ॥ १०५—१११ ॥
नारद उवाच
एवमुक्त्वाभ्यनुज्ञाय पुलस्त्यो भगवानृषिः । प्रीतः प्रीतेन मनसा तत्रैवान्तरधीयत ॥ ११२ ॥ नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर! ऐसा कहकर भीष्मजीकी अनुमति ले संतुष्ट हुए भगवान् पुलस्त्य मुनि प्रसन्नमनसे वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ११२ ॥ भीष्मश्च कुरुशार्दूल शास्त्रतत्त्वार्थदर्शिवान् । पुलस्त्यवचनाच्चैव पृथिवीं परिचक्रमे ॥ ११३ ॥