भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 664

कुरुश्रेष्ठ! सहदेवने यमुना-तटपर लाख स्वर्ण-मुद्राओंकी दक्षिणा देकर अग्निकी उपासना की थी*॥ ७ ॥ तत्रैव भरतो राजा चक्रवर्ती महायशाः । विंशतिः सप्त चाष्टौ च हयमेधानुपाहरत् ॥ ८ ॥ वहीं महायशस्वी चक्रवर्ती राजा भरतने पैंतीस अश्वमेधयज्ञोंका अनुष्ठान किया ॥ ८ ॥ कामकृद् यो द्विजातीनां श्रुतस्तात यथा पुरा । अत्यन्तमाश्रमः पुण्यः शरभंगस्य विश्रुतः ॥ ९ ॥ तात! प्राचीनकालमें राजा भरत ब्राह्मणोंकी मनोवाञ्छाको पूर्ण करनेवाला राजा सुना गया है। उत्तराखण्डमें ही महर्षि शरभङ्गका अत्यन्त पुण्यदायक आश्रम विख्यात है ॥ ९ ॥ सरस्वती नदी सद्भिः सततं पार्थ पूजिता । बालखिल्यैर्महाराज यत्रेष्टमृषिभिः पुरा ॥ १० ॥ कुन्तीनन्दन! साधु पुरुषोंने सरस्वती नदीकी सदा उपासना की है। महाराज! पूर्वकालमें बालखिल्य ऋषियोंने वहाँ यज्ञ किया था ॥ १० ॥ दृषद्वती महापुण्या यत्र ख्याता युधिष्ठिर । न्यग्रोधाख्यस्तु पुण्याख्यः पाञ्चाल्यो द्विपदां वर ॥ ११ ॥ दाल्भ्यघोषश्च दाल्भ्यश्च धरणीस्थो महात्मनः । कौन्तेयानन्तयशसः सुव्रतस्यामितौजसः ॥ १२ ॥ आश्रमः ख्यायते पुण्यस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः । युधिष्ठिर! परम पुण्यमयी दृषद्वती नदी भी उधर ही बतायी गयी है। मनुष्योंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! वहीं न्यग्रोध, पुण्य, पाञ्चाल्य, दाल्भ्यघोष और दाल्भ्य—ये पाँच आश्रम हैं तथा अनन्तकीर्ति एवं अमिततेजस्वी महात्मा सुव्रतका पुण्य आश्रम भी उत्तराखण्डमें ही बताया जाता है, जो पृथ्वीपर रहकर भी तीनों लोकोंमें विख्यात है ॥ एतावर्णविवर्णौ च विश्रुतौ मनुजाधिप ॥ १३ ॥ नरेश्वर! उत्तराखण्डमें ही विख्यात मुनि नर और नारायण हैं, जो एतावर्ण (श्यामवर्ण—साकार) होते हुए भी वास्तवमें अवर्ण (निराकार) ही हैं ॥ १३ ॥ वेदज्ञौ वेदविद्वांसौ वेदविद्याविदावुभौ । ईजाते क्रतुभिर्मुख्यैः पुण्यैर्भरतसत्तम ॥ १४ ॥ भरतश्रेष्ठ! ये दोनों मुनि वेदज्ञ, वेदके मर्मज्ञ तथा वेदविद्याके पूर्ण जानकार हैं। इन्होंने पुण्यदायक उत्तम यज्ञोंद्वारा शंकरका यजन किया है ॥ १४ ॥ समेत्य बहुशो देवाः सेन्द्राः सवरुणाः पुरा । विशाखयूपेऽतप्यन्त तेन पुण्यतमश्च सः ॥ १५ ॥ पूर्वकालमें इन्द्र, वरुण आदि बहुत-से देवताओंने मिलकर विशाखयूप नामक स्थानमें तप किया था, अतः वह अत्यन्त पुण्यप्रद स्थान है ॥ १५ ॥