महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 665, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंऋषिर्महान् महाभागो जमदग्निर्महायशाः । पलाशकेषु पुण्येषु रम्येष्वयजत प्रभुः ॥ १६ ॥ महाभाग, महायशस्वी और महाप्रभावशाली महर्षि जमदग्निने परम सुन्दर तथा पुण्यप्रद पलाशवनमें यज्ञ किया था ॥ १६ ॥
यत्र सर्वाः सरिच्छ्रेष्ठाः साक्षात् तमृषिसत्तमम् । स्वं स्वं तोयमुपादाय परिवार्योपतस्थिरे ॥ १७ ॥ जिसमें सब श्रेष्ठ नदियाँ मूर्तिमती हो अपना-अपना जल लेकर उन मुनिश्रेष्ठके पास आयीं और उन्हें सब ओरसे घेरकर खड़ी हुई थीं ॥ १७ ॥
अपि चात्र महाराज स्वयं विश्वावसुर्जगौ । इमं श्लोकं तदा वीर प्रेक्ष्य दीक्षां महात्मनः ॥ १८ ॥ वीर महाराज! यहाँ महात्मा जमदग्निकी वह यज्ञदीक्षा देखकर स्वयं गन्धर्वराज विश्वावसुने इस श्लोकका गान किया था ॥ १८ ॥
यजमानस्य वै देवाञ्जमदग्नेर्महात्मनः । आगम्य सरितो विप्रान् मधुना समतर्पयन् ॥ १९ ॥ ‘महात्मा जमदग्नि जब यज्ञद्वारा देवताओंका यजन कर रहे थे, उस समय उनके यज्ञमें सरिताओंने आकर मधुसे ब्राह्मणोंको तृप्त किया’ ॥ १९ ॥
गन्धर्वयक्षरक्षोभिरप्सरोभिश्च सेवितम् । किरातकिन्नरावासं शैलं शिखरिणां वरम् ॥ २० ॥ बिभेद तरसा गङ्गा गङ्गाद्वारं युधिष्ठिर । पुण्यं तत् ख्यायते राजन् ब्रह्मर्षिगणसेवितम् ॥ २१ ॥ युधिष्ठिर! गिरिश्रेष्ठ हिमालय किरातों और किन्नरोंका निवासस्थान है। गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और अप्सराएँ उसका सदा सेवन करती हैं। गङ्गाजी अपने वेगसे उस शैलराजको फोड़कर जहाँ प्रकट हुई हैं, वह पुण्यस्थान गङ्गाद्वार (हरिद्वार)-के नामसे विख्यात है। राजन्! उस तीर्थका ब्रह्मर्षिगण सदा सेवन करते हैं ॥ २०-२१ ॥
सनत्कुमारः कौरव्य पुण्यं कनखलं तथा । पर्वतश्च पुरुर्नाम यत्र यातः पुरूरवाः ॥ २२ ॥ कुरुनन्दन! पुण्यमय कनखलमें पहले सनत्कुमारने यात्रा की थी। वहीं पुरु नामसे प्रसिद्ध पर्वत है, जहाँ पूर्वकालमें पुरूरवाने यात्रा की थी ॥ २२ ॥
भृगुर्यत्र तपस्तेपे महर्षिगणसेविते । राजन् स आश्रमः ख्यातो भृगुतुङ्गो महागिरिः ॥ २३ ॥ राजन्! महर्षियोंसे सेवित जिस महान् पर्वतपर भृगुने तपस्या की थी वह भृगुतुंग आश्रमके नामसे विख्यात है ॥ २३ ॥
यः स भूतं भविष्यच्च भवच्च भरतर्षभ ।