महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 666, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंनारायणः प्रभुर्विष्णुः शाश्वतः पुरुषोत्तमः ॥ २४ ॥
तस्यातियशसः पुण्यां विशालां बदरीमनु ।
आश्रमः ख्यायते पुण्यस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ॥ २५ ॥
भरतश्रेष्ठ! भूत, भविष्य और वर्तमान जिनका स्वरूप है, जो सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापी, सनातन एवं पुरुषोत्तम नारायण हैं उन अत्यन्त यशस्वी श्रीहरिकी पुण्यमयी विशालापुरी बदरीवनके निकट है। वह नर-नारायणका आश्रम कहा गया है, वह पुण्यप्रद बदरिकाश्रम तीनों लोकोंमें विख्यात है ॥ २४-२५ ॥
उष्णतोयवहा गङ्गा शीततोयवहा पुरा ।
सुवर्णसिकता राजन् विशालां बदरीमनु ॥ २६ ॥
राजन्! पूर्वकालसे ही विशाला बदरीके समीप गंगा कहीं गरम जल तथा कहीं शीतल जल प्रवाहित करती हैं। उनकी बालू सुवर्णकी भाँति चमकती रहती है ॥ २६ ॥
ऋषयो यत्र देवाश्च महाभागा महौजसः ।
प्राप्य नित्यं नमस्यन्ति देवं नारायणं प्रभुम् ॥ २७ ॥
यत्र नारायणो देवः परमात्मा सनातनः ।
तत्र कृत्स्नं जगत् सर्वं तीर्थान्यायतनानि च ॥ २८ ॥
वहाँ महाभाग एवं महातेजस्वी देवता तथा महर्षि प्रतिदिन जाकर अमित प्रभावशाली भगवान् नारायणको नमस्कार करते हैं। जहाँ सनातन परमात्मा भगवान् नारायण विराजमान हैं वहाँ सम्पूर्ण जगत् है और समस्त तीर्थ तथा देवालय हैं ॥ २७-२८ ॥
तत् पुण्यं परमं ब्रह्म तत् तीर्थं तत् तपोवनम् ।
तत् परं परमं देवं भूतानां परमेश्वरम् ॥ २९ ॥
वह बदरिकाश्रम पुण्यक्षेत्र और परब्रह्मस्वरूप है। वही तीर्थ है, वही तपोवन है, वही सम्पूर्ण भूतोंका परमदेव परमेश्वर है ॥ २९ ॥
शाश्वतं परमं चैव धातारं परमं पदम् ।
यं विदित्वा न शोचन्ति विद्वांसः शास्त्रदृष्टयः ॥ ३० ॥
तत्र देवर्षयः सिद्धाः सर्वे चैव तपोधनाः ।
वही सनातन परमधाता एवं परमपद है, जिसे जान लेनेपर शास्त्रदर्शी विद्वान् कभी शोक नहीं करते हैं। वहीं देवर्षि सिद्ध और समस्त तपोधन महात्मा निवास करते हैं ॥ ३० १/२ ॥
आदिदेवो महायोगी यत्रास्ते मधुसूदनः ॥ ३१ ॥
पुण्यानामपि तत् पुण्यमत्र ते संशयोऽस्तु मा ।
एतानि राजन् पुण्यानि पृथिव्यां पृथिवीपते ॥ ३२ ॥
कीर्तितानि नरश्रेष्ठ तीर्थान्यायतनानि च ।
एतानि वसुभिः साध्यैरादित्यैर्मरुदश्विभिः ॥ ३३ ॥