भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 679

ध्रुवं प्राप्स्यसि दुष्प्रापाँल्लोकांस्तीर्थपरिप्लुतः ॥ ९ ॥ ‘भूपाल! भरतनन्दन! आप भी तीर्थोंमें नहाकर राजा कार्तवीर्य अर्जुन, राजर्षि अष्टक, लोमपाद और भूमण्डलमें सर्वत्र विदित सम्राट् वीरवर भरतको मिलनेवाले दुर्लभ लोकोंको अवश्य प्राप्त कर लेंगे ।। ८-९ ।।

प्रभासादीनि तीर्थानि महेन्द्रादींश्च पर्वतान् । गङ्गाद्याः सरितश्चैव प्लक्षादींश्च वनस्पतीन् ॥ १० ॥ त्वया सह महीपाल द्रष्टुमिच्छामहे वयम् । यदि ते ब्राह्मणेष्वस्ति काचित् प्रीतिर्जनाधिप ॥ ११ ॥ कुरु क्षिप्रं वचोऽस्माकं ततः श्रेयोऽभिपत्स्यसे । ‘महीपाल! प्रभास आदि तीर्थों, महेन्द्र आदि पर्वतों, गंगा आदि नदियों तथा प्लक्ष आदि वृक्षोंका हम आपके साथ दर्शन करना चाहते हैं। जनेश्वर! यदि आपके मनमें ब्राह्मणोंके प्रति कुछ प्रेम है तो आप हमारी बात शीघ्र मान लीजिये; इससे आपका कल्याण होगा ।। १०-११ १/२ ।।

तीर्थानि हि महाबाहो तपोविघ्नकरैः सदा ॥ १२ ॥ अनुकीर्णानि रक्षोभिस्तेभ्यो नस्त्रातुमर्हसि । ‘महाबाहो! तपस्यामें विघ्न डालनेवाले बहुत-से राक्षस उन तीर्थोंमें भरे पड़े हैं, उनसे आप हमारी रक्षा करनेमें समर्थ हैं' ।। १२ १/२ ।।

तीर्थान्युक्तानि धौम्येन नारदेन च धीमता ॥ १३ ॥ यान्युवाच च देवर्षिर्लोमशः सुमहातपाः । विधिवत् तानि सर्वाणि पर्यटस्व नराधिप ॥ १४ ॥ धूतपाप्मा सहास्माभिर्लोमशेनाभिपालितः । ‘नरेश्वर! आप पापरहित हैं, धौम्य मुनि, परम बुद्धिमान् नारदजी तथा महातपस्वी देवर्षि लोमशने जिन-जिन तीर्थोंका वर्णन किया है, उन सबमें आप महर्षि लोमशजीसे सुरक्षित हो हमारे साथ विधिपूर्वक भ्रमण करें' ।। १३-१४ १/२ ।।

स राजा पूज्यमानस्तैर्हर्षादश्रुपरिप्लुतः ॥ १५ ॥ भीमसेनादिभिर्वीरैर्भ्रातृभिः परिवारितः । बाढमित्यब्रवीत् सर्वांस्तानृषीन् पाण्डवर्षभः ॥ १६ ॥ लोमशं समनुज्ञाप्य धौम्यं चैव पुरोहितम् । पाण्डवश्रेष्ठ युधिष्ठिर अपने वीर भ्राता भीमसेन आदिसे घिरकर खड़े थे। उन ब्राह्मणोंद्वारा इस प्रकार सम्मानित होनेपर उनके नेत्रोंमें हर्षके आँसू भर आये। उन्होंने देवर्षि लोमश तथा पुरोहित धौम्यजीकी आज्ञा लेकर उन सब ऋषियोंसे ‘बहुत अच्छा’ कहकर उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया ।। १५-१६ १/२ ।।

ततः स पाण्डवश्रेष्ठो भ्रातृभिः सहितो वशी ॥ १७ ॥