भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 680, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 680

द्रौपद्या चानवद्याङ्ग्या गमनाय मनो दधे । तदनन्तर मन-इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले पाण्डवश्रेष्ठ युधिष्ठिरने भाइयों तथा सुन्दर अंगोंवाली द्रौपदीके साथ यात्रा करनेका मन-ही-मन निश्चय किया ॥ १७ १/२ ॥ अथ व्यासो महाभागस्तथा पर्वतनारदौ ॥ १८ ॥ काम्यके पाण्डवं द्रष्टुं समाजग्मुर्मनीषिणः । तेषां युधिष्ठिरो राजा पूजां चक्रे यथाविधि । सत्कृतास्ते महाभाग युधिष्ठिरमथाब्रुवन् ॥ १९ ॥ इतनेहीमें महाभाग व्यास, पर्वत और नारद आदि मनीषीजन काम्यकवनमें पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरसे मिलनेके लिये आये। राजा युधिष्ठिरने उनकी विधिपूर्वक पूजा की। उनसे सत्कार पाकर वे महाभाग महर्षि महाराज युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले ॥ १८-१९ ॥

ऋषय ऊचुः युधिष्ठिर यमौ भीम मनसा कुरुतार्जवम् । मनसा कृतशौचा वै शुद्धास्तीर्थानि यास्यथ ॥ २० ॥ ऋषियोंने कहा—युधिष्ठिर! भीमसेन! नकुल! और सहदेव! तुमलोग तीर्थोंके प्रति मनसे श्रद्धापूर्वक सरलभाव रखो। मनसे शुद्धिका सम्पादन करके शुद्धचित्त होकर तीर्थोंमें जाओ ॥ २० ॥ शरीरनियमं प्राहुर्ब्राह्मणा मानुषं व्रतम् । मनोविशुद्धां बुद्धिं च दैवमाहुर्व्रतं द्विजाः ॥ २१ ॥ ब्राह्मणलोग शरीर-शुद्धिके नियमको 'मानुषव्रत' बताते हैं और मनके द्वारा शुद्ध की हुई बुद्धिको 'दैवव्रत' कहते हैं ॥ २१ ॥ मनो ह्यदुष्टं शौचाय पर्याप्तं वै नराधिप । मैत्रीं बुद्धिं समास्थाय शुद्धास्तीर्थानि द्रक्ष्यथ ॥ २२ ॥ नरेश्वर! यदि मन राग-द्वेषसे दूषित न हो तो वह शुद्धिके लिये पर्याप्त माना गया है। सब प्राणियोंके प्रति मैत्री-बुद्धिका आश्रय ले शुद्धभावसे तीर्थोंका दर्शन करो ॥ २२ ॥ ते यूयं मानसैः शुद्धाः शरीरनियमव्रतैः । दैवं व्रतं समास्थाय यथोक्तं फलमाप्स्यथ ॥ २३ ॥ तुम मानसिक और शारीरिक नियमव्रतोंसे शुद्ध हो। दैवव्रतका आश्रय ले यात्रा करोगे तो तीर्थोंका तुम्हें यथावत् फल प्राप्त होगा ॥ २३ ॥ ते तथेति प्रतिज्ञाय कृष्णया सह पाण्डवाः । कृतस्वस्त्ययनाः सर्वे मुनिभिर्दिव्यमानुषैः ॥ २४ ॥ महर्षियोंके ऐसा कहनेपर द्रौपदीसहित पाण्डवोंने 'बहुत अच्छा' कहकर (उनकी आज्ञाएँ शिरोधार्य कीं और उनके बताये हुए नियमोंका पालन करनेकी) प्रतिज्ञा की।

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