महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 697, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंलोपामुद्रां ततः प्रादाद् विधिपूर्वं विशाम्पते ॥ ७ ॥ युधिष्ठिर! पुत्रीकी यह बात सुनकर राजाने महात्मा अगस्त्यमुनिको विधिपूर्वक अपनी कन्या लोपामुद्रा ब्याह दी ॥ ७ ॥
प्राप्य भार्यामगस्त्यस्तु लोपामुद्रामभाषत । महार्हाण्युत्सृजैतानि वासांस्याभरणानि च ॥ ८ ॥ लोपामुद्राको पत्नीरूपमें पाकर महर्षि अगस्त्यने उससे कहा—'ये तुम्हारे वस्त्र और आभूषण बहुमूल्य हैं। इन्हें उतार दो' ॥ ८ ॥
ततः सा दर्शनीयानि महार्हाणि तनूनि च । समुत्ससर्ज रम्भोरूर्वसनान्यायतेक्षणा ॥ ९ ॥ ततश्चीराणि जग्राह वल्कलाान्यजिनानि च । समानव्रतचर्या च बभूवायतलोचना ॥ १० ॥ तब कदलीके समान जाँघ तथा विशाल नेत्रोंवाली लोपामुद्राने अपने बहुमूल्य, महीन एवं दर्शनीय वस्त्र उतार दिये और फटे-पुराने वस्त्र तथा वल्कल और मृगचर्म धारण कर लिये। वह विशालनयनी बाला पतिके समान ही व्रत और आचारका पालन करनेवाली हो गयी ॥ ९-१० ॥
गङ्गाद्वारमथागम्य भगवानृषिसत्तमः । उग्रमातिष्ठत तपः सह पत्यानुकूलया ॥ ११ ॥ तदनन्तर मुनिश्रेष्ठ भगवान् अगस्त्य अपनी अनुकूल पत्नीके साथ गंगाद्वार (हरिद्वार)-में आकर घोर तपस्यामें संलग्न हो गये ॥ ११ ॥
सा प्रीता बहुमानाच्च पतिं पर्यचरत् तदा । अगस्त्यश्च परां प्रीतिं भार्यायामचरत् प्रभुः ॥ १२ ॥ लोपामुद्रा बड़ी ही प्रसन्नता और विशेष आदरके साथ पतिदेवकी सेवा करने लगी। शक्तिशाली महर्षि अगस्त्यजी भी अपनी पत्नीपर बड़ा प्रेम रखते थे ॥ १२ ॥
ततो बहुतिथे काले लोपामुद्रां विशाम्पते । तपसा द्योतितां स्नातां ददर्श भगवानृषिः ॥ १३ ॥ स तस्याः परिचारेण शौचेन च दमेन च । श्रिया रूपेण च प्रीतो मैथुनायाजुहाव ताम् ॥ १४ ॥ राजन्! जब इसी प्रकार बहुत समय व्यतीत हो गया, तब एक दिन भगवान् अगस्त्यमुनिने ऋतुस्नानसे निवृत्त हुई पत्नी लोपामुद्राको देखा। वह तपस्याके तेजसे प्रकाशित हो रही थी। महर्षिने अपनी पत्नीकी सेवा, पवित्रता, इन्द्रियसंयम, शोभा तथा रूप-सौन्दर्यसे प्रसन्न होकर उसे मैथुनके लिये पास बुलाया ॥ १३-१४ ॥
ततः सा प्राञ्जलिर्भूत्वा लज्जमानेव भाविनी । तदा सप्रणयं वाक्यं भगवन्तमथाब्रवीत् ॥ १५ ॥