महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतब अनुरागिणी लोपामुद्रा कुछ लज्जित-सी हो हाथ जोड़कर बड़े प्रेमसे भगवान् अगस्त्यसे बोली— ॥ १५ ॥
असंशयं प्रजाहेतोर्भार्यां पतिरविन्दत । या तु त्वयि मम प्रीतिस्तामृषे कर्तुमर्हसि ॥ १६ ॥
‘महर्षे! इसमें संदेह नहीं कि पतिदेवने अपनी इस पत्नीको संतानके लिये ही ग्रहण किया है, परंतु आपके प्रति मेरे हृदयमें जो प्रीति है, वह भी आपको सफल करनी चाहिये ॥ १६ ॥
यथा पितुर्गृहे विप्र प्रासादे शयनं मम । तथाविधे त्वं शयने मामुपैतुमिहार्हसि ॥ १७ ॥
‘ब्रह्मन्! मैं अपने पिताके घर उनके महलमें जैसी शय्यापर सोया करती थी, वैसी ही शय्यापर आप मेरे साथ समागम करें ॥ १७ ॥
इच्छामि त्वां स्रग्विणं च भूषणैश्च विभूषितम् । उपसर्तुं यथाकामं दिव्याभरणभूषिता ॥ १८ ॥
‘मैं चाहती हूँ कि आप सुन्दर हार और आभूषणोंसे विभूषित हों और मैं भी दिव्य अलंकारोंसे अलंकृत हो इच्छानुसार आपके साथ समागम-सुखका अनुभव करूँ ॥ १८ ॥