भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 706

ततो वायुः प्रादुरभूदधस्तस्य महात्मनः । शब्देन महता तात गर्जन्निव यथा घनः ॥ ७ ॥ तात! उस समय महात्मा अगस्त्यकी गुदासे गर्जते हुए मेघकी भाँति भारी आवाजके साथ अधोवायु निकली ॥ ७ ॥

वातापे निष्क्रमस्वेति पुनः पुनरुवाच ह । तं प्रहस्याब्रवीद् राजन्नगस्त्यो मुनिसत्तमः ॥ ८ ॥ इल्वल बार-बार कहने लगा—‘वातापे! निकलो-निकलो।’ राजन्! तब मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यने उससे हँसकर कहा— ॥ ८ ॥

कुतो निष्क्रमितुं शक्तो मया जीर्णस्तु सोऽसुरः । इल्वलस्तु विषण्णोऽभूद् दृष्ट्वा जीर्णं महासुरम् ॥ ९ ॥ ‘अब वह कैसे निकल सकता है, मैंने (लोकहितके लिये) उस असुरको पचा लिया है।’ महादैत्य वातापिको पच गया देख इल्वलको बड़ा खेद हुआ ॥ ९ ॥

प्राञ्जलिश्च सहामात्यैरिदं वचनमब्रवीत् । किमर्थमुपयाताः स्थ ब्रूत किं करवाणि वः ॥ १० ॥ उसने मन्त्रियोंसहित हाथ जोड़कर उन अतिथियोंसे यह बात पूछी—‘आपलोग किस प्रयोजनसे यहाँ पधारे हैं, बताइये, मैं आपलोगोंकी क्या सेवा करूँ?’ ॥ १० ॥

प्रत्युवाच ततोऽगस्त्यः प्रहसन्निल्वलं तदा । ईशं ह्यसुर विद्मस्तवां वयं सर्वे धनेश्वरम् ॥ ११ ॥ तब महर्षि अगस्त्यने हँसकर इल्वलसे कहा—‘असुर! हम सब लोग तुम्हें शक्तिशाली शासक एवं धनका स्वामी समझते हैं ॥ ११ ॥

एते च नातिधनिनो धनार्थश्च महान् मम । यथाशक्त्यविहिंस्यान्यान् संविभागं प्रयच्छ नः ॥ १२ ॥ ‘ये नरेश अधिक धनवान् नहीं हैं और मुझे बहुत धनकी आवश्यकता आ पड़ी है। अतः दूसरे जीवोंको कष्ट न देते हुए अपने धनमेंसे यथाशक्ति कुछ भाग हमें दो’ ॥ १२ ॥

ततोऽभिवाद्य तमृषिमिल्वलो वाक्यमब्रवीत् । दित्सितं यदि वेत्सि त्वं ततो दास्यामि ते वसु ॥ १३ ॥ तब इल्वलने महर्षिको प्रणाम करके कहा—‘मैं कितना धन देना चाहता हूँ? यह बात यदि आप जान लें तो मैं आपको धन दूँगा’ ॥ १३ ॥

अगस्त्य उवाच

गवां दशसहस्राणि राज्ञामेकैकशोऽसुर । तावदेव सुवर्णस्य दित्सितं ते महासुर ॥ १४ ॥