महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनशततमोऽध्यायः
अगस्त्यजीका इल्वलके यहाँ धनके लिये जाना, वातापि तथा इल्वलका वध, लोपामुद्राको पुत्रकी प्राप्ति तथा श्रीरामके द्वारा हरे हुए तेजकी परशुरामजीको तीर्थस्नानद्वारा पुनः प्राप्ति
लोमश उवाच
इल्वलस्तान् विदित्वा तु महर्षिसहितान् नृपान् ।
उपस्थितान् सहामात्यो विषयान्ते ह्यपूजयत् ॥ १ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**राजन्! इल्वलने महर्षिसहित उन राजाओंको आता जान मन्त्रियोंके साथ अपने राज्यकी सीमापर उपस्थित होकर उन सबका पूजन किया ॥ १ ॥
तेषां ततोऽसुरश्रेष्ठस्त्वातिथ्यमकरोत् तदा ।
सुसंस्कृतेन कौरव्य भ्रात्रा वातापिना यदा ॥ २ ॥
कुरुनन्दन! उस समय असुरश्रेष्ठ इल्वलने अपने भाई वातापिका मांस राँधकर उसके द्वारा उन सबका आतिथ्य किया ॥ २ ॥
ततो राजर्षयः सर्वे विषण्णा गतचेतसः ।
वातापिं संस्कृतं दृष्ट्वा मेषभूतं महासुरम् ॥ ३ ॥
भेड़के रूपमें महान् दैत्य वातापिको ही राँधा गया देख उन सभी राजर्षियोंका मन खिन्न हो गया और वे अचेतसे हो गये ॥ ३ ॥
अथाब्रवीदगस्त्यस्तान् राजर्षीन्नृषिसत्तमः ।
विषादो वो न कर्तव्यो ह्यहं भोक्ष्ये महासुरम् ॥ ४ ॥
धुर्यासनमथासाद्य निषसाद महानृषिः ।
तं पर्यवेषद् दैत्येन्द्र इल्वलः प्रहसन्निव ॥ ५ ॥
तब ऋषिश्रेष्ठ अगस्त्यने उन राजर्षियोंसे (आश्वासन देते हुए) कहा—'तुमलोगोंको चिन्ता नहीं करनी चाहिये। मैं ही इस महादैत्यको खा जाऊँगा।' ऐसा कहकर महर्षि अगस्त्य प्रधान आसनपर जा बैठे और दैत्यराज इल्वलने हँसते हुए-से उन्हें वह मांस परोस दिया ॥ ४-५ ॥
अगस्त्य एव कृत्स्नं तु वातापिं बुभुजे ततः ।
भुक्तवत्यसुरोऽऽह्वानमकरोत् तस्य चेल्वलः ॥ ६ ॥
अगस्त्यजी ही वातापिका सारा मांस खा गये; जब वे भोजन कर चुके, तब असुर इल्वलने वातापिका नाम लेकर पुकारा ॥ ६ ॥