महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 710, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तमेऽब्दे गते चापि प्राच्यवत् स महाकविः ।
ज्वलन्निव प्रभावेण दृढस्युर्नाम भारत ॥ २५ ॥
भारत! सात वर्ष बीतनेपर अपने तेज और प्रभावसे प्रज्वलित होता हुआ वह गर्भ उदरसे बाहर निकला। वही महाविद्वान् दृढस्युके नामसे विख्यात हुआ ॥ २५ ॥
साङ्गोपनिषदन् वेदाञ्जपन्निव महातपाः ।
तस्य पुत्रोऽभवदृषेः स तेजस्वी महाद्विजः ॥ २६ ॥
महर्षिका वह महातपस्वी और तेजस्वी पुत्र जन्म-कालसे ही अंग और उपनिषदोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका स्वाध्याय-सा करता जान पड़ा। दृढस्यु ब्राह्मणोंमें महान् माने गये ॥ २६ ॥
स बाल एव तेजस्वी पितुस्तस्य निवेशने ।
इध्मानां भारमाजह्रे इध्मवाहस्ततोऽभवत् ॥ २७ ॥
पिताके घरमें रहते हुए तेजस्वी दृढस्यु बाल्य-कालसे ही इध्म (समिधा)-का भार वहन करके लाने लगे; अतः ‘इध्मवाह’ नामसे विख्यात हो गये ॥ २७ ॥
तथायुक्तं तु तं दृष्ट्वा मुमुदे स मुनिस्तदा ।
एवं स जनयामास भारतापत्यमुत्तमम् ॥ २८ ॥
अपने पुत्रको स्वाध्याय और समिधानयनके कार्यमें संलग्न देख महर्षि अगस्त्य उस समय बहुत प्रसन्न हुए। भारत! इस प्रकार अगस्त्यजीने उत्तम संतान उत्पन्न की ॥ २८ ॥
लेभिरे पितरश्चास्य लोकान् राजन् यथेप्सितान् ।
तत ऊर्ध्वमयं ख्यातस्त्वगस्त्यस्याश्रमो भुवि ॥ २९ ॥
राजन्! तदनन्तर उनके पितरोंने मनोवांछित लोक प्राप्त कर लिये। उसके बादसे यह स्थान इस पृथ्वीपर अगस्त्याश्रमके नामसे विख्यात हो गया ॥ २९ ॥
प्राह्लादिरेवं वातापिरगस्त्येनोपशामितः ।
तस्यायमाश्रमो राजन् रमणीयैर्गुणैर्युतः ॥ ३० ॥
वातापि प्रह्लादके गोत्रमें उत्पन्न हुआ था, जिसे अगस्त्यजीने इस प्रकार शान्त कर दिया। राजन्! यह उन्हींका रमणीय गुणोंसे युक्त आश्रम है ॥ ३० ॥
एषा भागीरथी पुण्या देवगन्धर्वसेविता ।
वातेरिता पताकेव विराजति नभस्तले ॥ ३१ ॥
इसके-समीप यह वही देव-गन्धर्वसेवित पुण्यसलिला भागीरथी है, जो आकाशमें वायुकी प्रेरणासे फहरानेवाली श्वेत पताकाके समान सुशोभित हो रही है ॥ ३१ ॥
प्रतार्यमाणा कूटेषु यथा निम्नेषु नित्यशः ।
शिलातलेषु संत्रस्ता पन्नगेन्द्रवधूरिव ॥ ३२ ॥
यह क्रमशः नीचे-नीचेके शिखरोंपर गिरती हुई सदा तीव्रगतिसे बहती है और शिलाखण्डोंके नीचे इस प्रकार समायी जाती है, मानो भयभीत सर्पिणी बिलमें घुसी जा रही हो ॥ ३२ ॥