भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 711

दक्षिणां वै दिशं सर्वां प्लावयन्ती च मातृवत् । पूर्वं शम्भोजटाभ्रष्टा समुद्रमहिषी प्रिया । अस्यां नद्यां सुपुण्यायां यथेष्टमवगाह्यताम् ।। ३३ ।। पहले भगवान् शंकरकी जटासे गिरकर प्रवाहित होनेवाली समुद्रकी प्रियतमा महारानी गंगा सम्पूर्ण दक्षिण दिशाको इस प्रकार आप्लावित कर रही है, मानो माता अपनी संतानको नहला रही हो। इस परम पवित्र नदीमें तुम इच्छानुसार स्नान करो ।। ३३ ।। युधिष्ठिर निबोधेदं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । भृगोस्तीर्थं महाराज महर्षिगणसेवितम् ।। ३४ ।। महाराज युधिष्ठिर! इधर ध्यान दो, यह महर्षि-गणसेवित भृगुतीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें विख्यात है ।। यत्रोपस्पृष्टवान् रामो हृतं तेजस्तदाऽऽप्तवान् । अत्र त्वं भ्रातृभिः सार्धं कृष्णया चैव पाण्डव ।। ३५ ।। दुर्योधनहृतं तेजः पुनरादातुमर्हसि । कृतवैरेण रामेण यथा चोपहृतं पुनः ।। ३६ ।। जहाँ परशुरामजीने स्नान किया और उसी क्षण अपने खोये हुए तेजको पुनः प्राप्त कर लिया। पाण्डुनन्दन! तुम अपने भाइयों और द्रौपदीके साथ इसमें स्नान करके दुर्योधनद्वारा छीने हुए अपने तेजको पुनः प्राप्त कर सकते हो। जैसे दशरथनन्दन श्रीरामसे वैर करनेपर उनके द्वारा अपहृत हुए तेजको परशुरामने यहाँ स्नानके प्रभावसे पुनः पा लिया था ।। ३५-३६ ।।

वैशम्पायन उवाच

स तत्र भ्रातृभिश्चैव कृष्णया चैव पाण्डवः । स्नात्वा देवान् पितॄंश्चैव तर्पयामास भारत ।। ३७ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब राजा युधिष्ठिरने अपने भाइयों और द्रौपदीके साथ उस तीर्थमें स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण किया ।। ३७ ।। तस्य तीर्थस्य रूपं वै दीप्ताद् दीप्ततरं बभौ । अप्रधृष्यतरश्चासीच्छात्रावाणां नरर्षभ ।। ३८ ।। नरश्रेष्ठ! उस तीर्थमें स्नान कर लेनेपर राजा युधिष्ठिरका रूप अत्यन्त तेजोयुक्त हो प्रकाशमान हो गया। अब वे शत्रुओंके लिये परम दुर्धर्ष हो गये ।। ३८ ।। अपृच्छच्चैव राजेन्द्र लोमशं पाण्डुनन्दनः । भगवन् किमर्थं रामस्य हृतमासीद् वपुः प्रभो । कथं प्रत्याहृतं चैव एतदाचक्ष्व पृच्छतः ।। ३९ ।।