महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 715, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिकम्पैश्च निर्घातैर्नदैश्च विपुलैरपि ॥ ६२ ॥ तदनन्तर भगवान् विष्णुरूप श्रीरामचन्द्रजीने उस बाणको छोड़ा। भारत! उस समय सारी पृथ्वी बिना बादलकी बिजली और बड़ी-बड़ी उल्काओंसे व्याप्त-सी हो उठी। बड़े जोरकी आँधी उठी और सब ओर धूलकी वर्षा होने लगी। फिर मेघोंकी घटा घिर आयी और भूतलपर मूसलाधार वर्षा होने लगी। बार-बार भूकम्प होने लगा। मेघगर्जन तथा अन्य भयानक उत्पातसूचक शब्द गूँजने लगे ।। ६१-६२ ।। स रामं विह्वलं कृत्वा तेजश्चाक्षिप्य केवलम् । आगच्छज्ज्वलितो बाणो रामबाहुप्रचोदितः ॥ ६३ ॥ श्रीरामचन्द्रजीकी भुजाओंसे प्रेरित हुआ वह प्रज्वलित बाण परशुरामजीको व्याकुल करके केवल उनके तेजको छीनकर पुनः लौट आया ।। ६३ ।। स तु विह्वलतां गत्वा प्रतिलभ्य च चेतनाम् । रामः प्रत्यागतप्राणः प्राणमद् विष्णुतेजसम् ॥ ६४ ॥ विष्णुना सोऽभ्यनुज्ञातो महेन्द्रमगमत् पुनः । भीतस्तु तत्र न्यवसद् व्रीडितस्तु महातपाः ॥ ६५ ॥ परशुरामजी एक बार मूर्च्छित होकर जब पुनः होशमें आये तब मरकर जी उठे हुए मनुष्यकी भाँति उन्होंने विष्णुतेज धारण करनेवाले भगवान् श्रीरामको नमस्कार किया। तत्पश्चात् भगवान् विष्णु श्रीरामकी आज्ञा लेकर वे पुनः महेन्द्रपर्वतपर चले गये। वहाँ भयभीत और लज्जित हो महान् तपस्यामें संलग्न होकर रहने लगे ।। ६४-६५ ।। ततः संवत्सरेऽतीते हृतौजसमवस्थितम् । निर्मदं दुःखितं दृष्ट्वा पितरो राममब्रुवन् ॥ ६६ ॥ तदनन्तर एक वर्ष व्यतीत होनेपर तेजोहीन और अभिमानशून्य होकर रहनेवाले परशुरामको दुःखी देखकर उनके पितरोंने कहा ।। ६६ ।।
पितर ऊचुः
न वै सम्यगिदं पुत्र विष्णुमासाद्य वै कृतम् । स हि पूज्यश्च मान्यश्च त्रिषु लोकेषु सर्वदा ॥ ६७ ॥ **पितर बोले—**तुमने भगवान् विष्णुके पास जाकर जो बर्ताव किया है वह ठीक नहीं था। वे तीनों लोकोंमें सर्वदा पूजनीय और माननीय हैं ।। ६७ ।। गच्छ पुत्र नदीं पुण्यां वधूसरकृताह्वयाम् । तत्रोपस्पृश्य तीर्थेषु पुनर्वपुरवाप्स्यसि ॥ ६८ ॥ बेटा! अब तुम वधूसर नामक पुण्यमयी नदीके तटपर जाओ। वहाँ तीर्थोंमें स्नान करके पूर्ववत् अपना तेजोमय शरीर पुनः प्राप्त कर लोगे ।। ६८ ।। दीप्तोदं नाम तत् तीर्थं यत्र ते प्रपितामहः ।