महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 716, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंभृगुर्देवयुगे राम तप्तवानुत्तमं तपः ॥ ६९ ॥
राम! वह दीप्तोदक नामक तीर्थ है, जहाँ देवयुगमें तुम्हारे प्रपितामह भृगुने उत्तम तपस्या की थी ॥ ६९ ॥
तत् तथा कृतवान् रामः कौन्तेय वचनात् पितुः ।
प्राप्तवांश्च पुनस्तेजस्तीर्थेऽस्मिन् पाण्डुनन्दन ॥ ७० ॥
कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! पितरोंके कहनेसे परशुरामजीने वैसा ही किया। पाण्डुनन्दन! इस तीर्थमें नहाकर पुनः उन्होंने अपना तेज प्राप्त कर लिया ॥ ७० ॥
एतदीदृशकं तात रामेणाक्लिष्टकर्मणा ।
प्राप्तमासीन्महाराज विष्णुमासाद्य वै पुरा ॥ ७१ ॥
तात महाराज युधिष्ठिर! इस प्रकार पूर्वकालमें अनायास ही महान् कर्म करनेवाले परशुराम विष्णुस्वरूप श्रीरामचन्द्रजीसे भिड़कर इस दशाको प्राप्त हुए थे ॥ ७१ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां
जामदग्न्यतेजोहानिकथने एकोनशततमोऽध्यायः ॥ ९९ ॥
इस प्रकार महाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें
परशुरामके तेजकी हानिविषयक निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ७४ श्लोक हैं)