भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 730

इस भूतलपर कुछ महान् धनुर्धर शूरवीर भी थे, जो अत्यन्त हर्ष और उत्साहसे युक्त हो दानवोंके स्थानका पता लगाते हुए उनके दमनके लिये भारी प्रयत्न करने लगे ॥ १५ ॥
न चैतानधिजग्मुस्ते समुद्रं समुपाश्रितान् ।
श्रमं जग्मुश्च परममाजग्मुः क्षयमेव च ॥ १६ ॥
परंतु समुद्रमें छिपे हुए दानवोंको वे पकड़ नहीं पाते। उन्होंने बहुत परिश्रम किया और अन्तमें थककर वे पुनः अपने घरको ही लौट आये ॥ १६ ॥
जगत्युपशमं याते नष्टयज्ञोत्सवक्रिये ।
आजग्मुः परमामार्तिं त्रिदशा मनुजेश्वर ॥ १७ ॥
मनुजेश्वर! यज्ञोत्सव आदि कार्योंके नष्ट हो जानेपर जब जगत्का विनाश होने लगा, तब देवताओंको बड़ी पीड़ा हुई ॥ १७ ॥
समेत्य समहेन्द्राश्च भयान्मन्त्रं प्रचक्रिरे ।
शरण्यं शरणं देवं नारायणमजं विभुम् ॥ १८ ॥
तेऽभिगम्य नमस्कृत्य वैकुण्ठमपराजितम् ।
ततो देवाः समस्तास्ते तदोचुर्मधुसूदनम् ॥ १९ ॥
इन्द्र आदि सब देवताओंने मिलकर भयसे मुक्त होनेके लिये मन्त्रणा की। फिर वे समस्त देवता सबको शरण देनेवाले, शरणागतवत्सल, अजन्मा एवं सर्वव्यापी, अपराजित वैकुण्ठनाथ भगवान् नारायणदेवकी शरणमें गये और नमस्कार करके उन मधुसूदनसे बोले — ॥
त्वं नः स्रष्टा च भर्ता च हर्ता च जगतः प्रभो ।
त्वया सृष्टमिदं विश्वं यच्चेङ्गं यच्च नेङ्गति ॥ २० ॥
'प्रभो! आप ही हमारे स्रष्टा और पालक हैं। आप ही सम्पूर्ण जगत्का संहार करनेवाले हैं। इस स्थावर और जंगम सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि आपने ही की है ॥
त्वया भूमिः पुरा नष्टा समुद्रात् पुष्करेक्षण ।
वाराहं वपुराश्रित्य जगदर्थे समुद्धृता ॥ २१ ॥
'कमलनयन! पूर्वकालमें आपने वाराहरूप धारण करके सम्पूर्ण जगत्के हितके लिये समुद्रके जलसे इस खोयी हुई पृथ्वीका उद्धार किया था ॥ २१ ॥
आदिदैत्यो महावीर्यो हिरण्यकशिपुः पुरा ।
नारसिंहं वपुः कृत्वा सूदतः पुरुषोत्तम ॥ २२ ॥
'पुरुषोत्तम! प्राचीनकालमें आपने ही नृसिंह-शरीर धारण करके महापराक्रमी आदिदैत्य हिरण्यकशिपुका वध किया था ॥ २२ ॥
अवध्यः सर्वभूतानां बलिश्चापि महासुरः ।
वामनं वपुराश्रित्य त्रैलोक्याद् भ्रंशितस्त्वया ॥ २३ ॥