महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 731, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें'सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये अवध्य महादैत्य बलिको भी आपने ही वामनरूप धारण करके त्रिलोकीके राज्यसे वंचित किया ।। २३ ।। असुरश्च महेष्वासो जम्भ इत्यभिविश्रुतः । यज्ञक्षोभकरः क्रूरस्त्वयैव विनिपातितः ।। २४ ।। 'यज्ञोंका नाश करनेवाले क्रूरकर्मा महाधनुर्धर जम्भ नामसे विख्यात असुरको भी आपने ही मार गिराया था ।। २४ ।। एवमादीनि कर्माणि येषां संख्या न विद्यते । अस्माकं भयभीतानां त्वं गतिर्मधुसूदन ।। २५ ।। 'ऐसे-ऐसे आपके अनेक कर्म हैं, जिनकी कोई संख्या नहीं है। मधुसूदन! हम भयभीत देवताओंके एकमात्र आश्रय आप ही हैं ।। २५ ।। तस्मात् त्वां देवदेवेश लोकार्थं ज्ञापयामहे । रक्ष लोकांश्च देवांश्च शक्रं च महतो भयात् ।। २६ ।। 'देवदेवेश्वर! इसीलिये लोकहितके उद्देश्यसे हम यह निवेदन कर रहे हैं कि आप सम्पूर्ण जगत्के प्राणियों, देवताओं और इन्द्रकी भी महान् भयसे रक्षा कीजिये' ।। २६ ।। इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां विष्णुस्तवे द्व्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १०२ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें विष्णुस्तुतिविषयक एक सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०२ ।।