भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 742, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 742

त्वं नस्त्राता विधाता च लोकानां लोकभावन ।
त्वत्प्रसादात् समुच्छेदं न गच्छेत् सामरं जगत् ॥ ५ ॥
‘लोकभावन महर्षे! आप हमारे रक्षक तथा सम्पूर्ण लोकोंके विधाता हैं। आपकी कृपासे अब देवताओंसहित सम्पूर्ण जगत् विनाशको नहीं प्राप्त होगा’ ॥ ५ ॥
स पूज्यमानस्त्रिदशैर्महात्मा
गन्धर्वतूर्येषु नदत्सु सर्वशः ।
दिव्यैश्च पुष्पै्रवकीर्यमाणो
महार्णवं निःसलिलं चकार ॥ ६ ॥
इस प्रकार जब देवता महात्मा अगस्त्यकी प्रशंसा कर रहे थे, सब ओर गन्धर्वोंके वाद्योंकी ध्वनि फैल रही थी और अगस्त्यजी पर दिव्य फूलोंकी बौछार हो रही थी, उसी समय अगस्त्यजीने सम्पूर्ण महासागरको जलशून्य कर दिया ॥ ६ ॥
दृष्ट्वा कृतं निःसलिलं महार्णवं
सुराः समस्ताः परमप्रहृष्टाः ।
प्रगृह्य दिव्यानि वरायुधानि
तान् दानवाञ्जघ्नुरदीनसत्त्वाः ॥ ७ ॥

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