महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 743, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंउस महासमुद्रको निर्जल हुआ देख सब देवता बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने अपने दिव्य एवं श्रेष्ठ आयुध लेकर अत्यन्त उत्साहसे सम्पन्न हो दानवोंपर आक्रमण किया ॥ ७ ॥
ते वध्यमानास्त्रिदशैर्महात्मभि- र्महाबलैर्वेगिभिरुन्नदद्भिः । न सेहिरे वेगवतां महात्मनां वेगं तदा धारयितुं दिवौकसाम् ॥ ८ ॥
महान् बलवान्, वेगशाली और महाबुद्धिमान् देवता जब सिंहगर्जना करते हुए दैत्योंको मारने लगे उस समय वे उन वेगवान् महामना देवताओंका वेग न सह सके ॥ ८ ॥
ते वध्यमानास्त्रिदशैर्दानवा भीमनिःस्वनाः । चक्रुः सुतुमुलं युद्धं मुहूर्तमिव भारत ॥ ९ ॥
भरतनन्दन! देवताओंकी मार पड़नेपर दानवोंने भी भयंकर गर्जना करते हुए दो घड़ीतक उनके साथ घोर युद्ध किया ॥ ९ ॥
ते पूर्वं तपसा दग्धा मुनिभिर्भावितात्मभिः । यतमानाः परं शक्त्या त्रिदशैर्विनिषूदिताः ॥ १० ॥
उन दैत्योंको शुद्ध अन्तःकरणवाले मुनियोंने अपनी तपस्याद्वारा पहलेसे ही दग्ध-सा कर रखा था, अतः पूरी शक्ति लगाकर अधिक-से-अधिक प्रयास करनेपर भी देवताओंद्वारा वे मार डाले गये ॥ १० ॥
ते हेमनिष्काभरणाः कुण्डलाङ्गदधारिणः । निहता बह्वशोभन्त पुष्पिता इव किंशुकाः ॥ ११ ॥
सोनेकी मोहरोंकी मालाओंसे भूषित तथा कुण्डल एवं बाजूबंदधारी दैत्य वहाँ मारे जाकर खिले हुए पलाशके वृक्षोंकी भाँति अधिक शोभा पा रहे थे ॥ ११ ॥
हतशेषास्ततः केचित् कालेया मनुजोत्तम । विदार्य वसुधां देवीं पातालतलमास्थिताः ॥ १२ ॥
नरश्रेष्ठ! मरनेसे बचे हुए कुछ कालेय दैत्य वसुन्धरा देवीको विदीर्ण करके पातालमें चले गये ॥ १२ ॥
निहतान् दानवान् दृष्ट्वा त्रिदशा मुनिपुङ्गवम् । तुष्टुवुर्विविधैर्वाक्यैरिदं वचनमब्रुवन् ॥ १३ ॥
सब दानवोंको मारा गया देख देवताओंने नाना प्रकारके वचनोंद्वारा मुनिवर अगस्त्यजीका स्तवन किया और यह बात कही— ॥ १३ ॥
त्वत्प्रसादान्महाभाग लोकैः प्राप्तं महत् सुखम् । त्वत्तेजसा च निहताः कालेयाः क्रूरविक्रमाः ॥ १४ ॥
‘महाभाग! आपकी कृपासे समस्त लोकोंने महान् सुख प्राप्त किया है; क्योंकि क्रूरतापूर्ण पराक्रम दिखानेवाले कालेय दैत्य आपके तेजसे दग्ध हो गये ॥ १४ ॥