महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 744, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूरयस्व महाबाहो समुद्रं लोकभावन । यत् त्वया सलिलं पीतं तदस्मिन् पुनरुत्सृज ॥ १५ ॥ 'मुने! आपकी बाँहें बड़ी हैं। आप नूतन संसारकी सृष्टि करनेमें समर्थ हैं। अब आप समुद्रको फिर भर दीजिये। आपने जो इसका जल पी लिया है उसे फिर इसीमें छोड़ दीजिये' ॥ १५ ॥
एवमुक्तः प्रत्युवाच भगवान् मुनिपुङ्गवः । (तांस्तदा सहितान् देवानगस्त्यः सपुरन्दरान् ।) जीर्णं तद्धि मया तोयमुपायोऽन्यःप्रचिन्त्यताम् ॥ १६ ॥ पूरणार्थं समुद्रस्य भवद्भिर्यत्नमास्थितैः । एतच्छ्रुत्वा तु वचनं महर्षेर्भावितात्मनः ॥ १७ ॥ विस्मिताश्च विषण्णाश्च बभूवुः सहिताः सुराः । परस्परमनुज्ञाप्य प्रणम्य मुनिपुङ्गवम् ॥ १८ ॥ उनके ऐसा कहनेपर मुनिप्रवर भगवान् अगस्त्यने वहाँ एकत्र हुए इन्द्र आदि समस्त देवताओंसे उस समय यों कहा—'देवगण! वह जल तो मैंने पचा लिया, अतः समुद्रको भरनेके लिये सतत प्रयत्नशील रहकर आपलोग कोई दूसरा ही उपाय सोचें।' शुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षिका यह वचन सुनकर सब देवता बड़े विस्मित हो गये; उनके मनमें विषाद छा गया। वे आपसमें सलाह करके मुनिवर अगस्त्यजीको प्रणाम कर वहाँसे चल दिये ॥ १६—१८ ॥
प्रजाः सर्वा महाराज विप्रजग्मुर्यथागतम् । त्रिदशा विष्णुना सार्धमुपजग्मुः पितामहम् ॥ १९ ॥ महाराज! फिर सारी प्रजा जैसे आयी थी, वैसे ही लौट गयी। देवतालोग भगवान् विष्णुके साथ ब्रह्माजीके पास गये ॥ १९ ॥
पूरणार्थं समुद्रस्य मन्त्रयित्वा पुनः पुनः । (ते धातारमुपागम्य त्रिदशाः सह विष्णुना ।) ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे सागरस्याभिपूरणम् ॥ २० ॥ समुद्रको भरनेके उद्देश्यसे बार-बार आपसमें सलाह करके श्रीविष्णुसहित सब देवता ब्रह्माजीके निकट जा हाथ जोड़कर यह पूछने लगे कि 'समुद्रको पुनः भरनेके लिये क्या उपाय किया जाय' ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामगस्त्योपाख्याने पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अगस्त्योपाख्यानविषयक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०५ ॥