महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 775, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंसह तोयेन तृषिता गर्भिणी चाभवत् ततः । सा पुरोक्ता भगवता ब्रह्मणा लोककर्तृणा ॥ ३६ ॥ देवकन्या मृगी भूत्वा मुनिं सूय विमोक्ष्यसे । अमोघत्वाद् विधेश्चैव भावित्वाद् दैवनिर्मितात् ॥ ३७ ॥ तस्यां मृग्यां समभवत् तस्य पुत्रो महानृषिः । ऋष्यशृङ्गस्तपोनित्यो वन एवाभ्यवर्तत ॥ ३८ ॥
राजन्! एक दिन जब वे जलमें स्नान कर रहे थे, उर्वशी अप्सराको देखकर उनका वीर्य स्खलित हो गया। उसी समय प्याससे व्याकुल हुई एक मृगी वहाँ आयी और पानीके साथ उस वीर्यको भी पी गयी। इससे उसके गर्भ रह गया। वह पूर्वजन्ममें एक देवकन्या थी। लोकस्रष्टा भगवान् ब्रह्माने उसे यह वचन दिया था कि तू मृगी होकर एक मुनिको जन्म देनेके पश्चात् उस योनिसे मुक्त हो जायगी। ब्रह्माजीकी वाणी अमोघ है और दैवके विधानको कोई टाल नहीं सकता, इसलिये विभाण्डकके पुत्र महर्षि ऋष्यशृंगका जन्म मृगीके ही पेटसे हुआ। वे सदा तपस्यामें संलग्न रहकर वनमें ही निवास करते थे ॥ ३५-३८ ॥
तस्यर्षेः शृङ्गं शिरसि राजन्नासीन्महात्मनः ।