भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 776

तेनर्ष्यशृङ्ग इत्येवं तदा स प्रथितोऽभवत् ॥ ३९ ॥ राजन्! उन महात्मा मुनिके सिरपर एक सींग था, इसलिये उस समय उनका ऋष्यशृंग नाम प्रसिद्ध हुआ ॥ ३९ ॥

न तेन दृष्टपूर्वोऽन्यः पितुरन्यत्र मानुषः । तस्मात् तस्य मनो नित्यं ब्रह्मचर्येऽभवन्नृप ॥ ४० ॥ नरेश्वर! उन्होंने अपने पिताके सिवा दूसरे किसी मनुष्यको पहले कभी नहीं देखा था, इसलिये उनका मन सदा स्वभावसे ही ब्रह्मचर्यमें संलग्न रहता था ॥ ४० ॥

एतस्मिन्नेव काले तु सखा दशरथस्य वै । लोमपाद इति ख्यातो ह्यङ्गानामीश्वरोऽभवत् ॥ ४१ ॥ इन्हीं दिनों राजा दशरथके मित्र लोमपाद अंगदेशके राजा हुए ॥ ४१ ॥

तेन कामात् कृतं मिथ्या ब्राह्मणस्येति नः श्रुतिः । स ब्राह्मणैः परित्यक्तस्ततो वै जगतः पतिः ॥ ४२ ॥ पुरोहितापहाराच्च तस्य राज्ञो यदृच्छया । न ववर्ष सहस्राक्षस्ततोऽपीड्यन्त वै प्रजाः ॥ ४३ ॥ उन्होंने जान-बूझकर एक ब्राह्मणके साथ मिथ्या व्यवहार किया—यह बात हमारे सुननेमें आयी है। इसी अपराधके कारण ब्राह्मणोंने राजा लोमपादको त्याग दिया था। राजाने पुरोहितपर मनमाना दोषारोपण किया था, इसलिये इन्द्रने उनके राज्यमें वर्षा बंद कर दी। इस अनावृष्टिके कारण प्रजाको बड़ा कष्ट होने लगा ॥ ४२-४३ ॥

स ब्राह्मणान् पर्यपृच्छत् तपोयुक्तान् मनीषिणः । प्रवर्षणे सुरेन्द्रस्य समर्थान् पृथिवीपते ॥ ४४ ॥ युधिष्ठिर! तब राजाने तपस्वी, मेधावी और इन्द्रसे वर्षा करवानेमें समर्थ ब्राह्मणोंको बुलाकर इस संकटके निवारणका उपाय पूछा ॥ ४४ ॥

कथं प्रवर्षेत् पर्जन्य उपायः परिदृश्यताम् । तमूचुश्चोदितास्ते तु स्वमतानि मनीषिणः ॥ ४५ ॥ 'विप्रगण! मेघ कैसे वर्षा करे—यह उपाय सोचिये।' उनके पूछनेपर मनीषी महात्माओंने अपना-अपना विचार बताया ॥ ४५ ॥

तत्र त्वेको मुनिवरस्तं राजानमुवाच ह । कुपितास्तव राजेन्द्र ब्राह्मणा निष्कृतिं चर ॥ ४६ ॥ उन्हीं ब्राह्मणोंमें एक श्रेष्ठ महर्षि भी थे। उन्होंने राजासे कहा—'राजेन्द्र! तुम्हारे ऊपर ब्राह्मण कुपित हैं; इसके लिये तुम प्रायश्चित्त करो' ॥ ४६ ॥

ऋष्यशृङ्गं मुनिसुतमानयस्व च पार्थिव । वानेयमनभिज्ञं च नारीणामार्जवे रतम् ॥ ४७ ॥ स चेदवतरेद् राजन् विषयं ते महातपाः ।