भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 777, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 777

सद्यः प्रवर्षेत् पर्जन्य इति मे नात्र संशयः ॥ ४८ ॥ 'भूपाल! साथ ही हम तुम्हें यह सलाह देते हैं कि अपने राज्यमें महर्षि विभाण्डकके पुत्र वनवासी ऋष्यशृंगको बुलाओ। वे स्त्रियोंसे सर्वथा अपरिचित हैं और सदा सरल व्यवहारमें ही तत्पर रहते हैं। महाराज! वे महातपस्वी ऋष्यशृङ्ग यदि आपके राज्यमें पदार्पण करें तो तत्काल ही मेघ वर्षा करेगा इस विषयमें मुझे तनिक भी संदेह नहीं है' ॥ ४७-४८ ॥

एतच्छ्रुत्वा वचो राजन् कृत्वा निष्कृतिमात्मनः । स गत्वा पुनरागच्छत् प्रसन्नेषु द्विजातिषु ॥ ४९ ॥ 'राजन्! यह सुनकर राजा लोमपाद अपने अपराधका प्रायश्चित्त करके ब्राह्मणोंके पास गये और जब वे प्रसन्न हो गये तब पुनः अपनी राजधानीको लौट आये' ॥ ४९ ॥

राजानमागतं श्रुत्वा प्रतिसंजहृषुः प्रजाः । ततोऽङ्गपतिराहूय सचिवान् मन्त्रकोविदान् ॥ ५० ॥ ऋष्यशृङ्गागमे यत्नमकरोन्मन्त्रनिश्चये । सोऽध्यगच्छदुपायं तु तैरमात्यैः सहाच्युतः ॥ ५१ ॥ शास्त्रज्ञैरलमर्थज्ञैर्नीत्यां च परिनिष्ठितैः । ततश्चानाययामास वारमुख्या महीपतिः ॥ ५२ ॥ वेश्याः सर्वत्र निष्णातास्ता उवाच स पार्थिवः । ऋष्यशृङ्गमृषेः पुत्रमानयध्वमुपायतः ॥ ५३ ॥ राजाका आगमन सुनकर प्रजाजनोंको बड़ा हर्ष हुआ। तदनन्तर अंगराज मन्त्रकुशल मन्त्रियोंको बुलाकर उनसे सलाह करके एक निश्चयपर पहुँच जानेके बाद मुनिकुमार ऋष्यशृंगको अपने यहाँ ले आनेके प्रयत्नमें लग गये। राजाके मन्त्री शास्त्रज्ञ, अर्थशास्त्रके विद्वान् और नीतिनिपुण थे। अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले नरेशने उन मन्त्रियोंके साथ विचार करके एक उपाय जान लिया। तत्पश्चात् भूपाल लोमपादने दूसरोंको लुभानेकी सब कलाओंमें कुशल प्रधान-प्रधान वेश्याओंको बुलाया और कहा—'तुमलोग कोई उपाय करके मुनिकुमार ऋष्यशृंगको यहाँ ले आओ ॥ ५०—५३ ॥

लोभयित्वाभिविश्वास्य विषयं मम शोभनाः । ता राजभयभीताश्च शापभीताश्च योषितः ॥ ५४ ॥ अशक्यमूचुस्तत् कार्यं विवर्णा गतचेतसः । तत्र त्वेका जरद्योषा राजानमिदमब्रवीत् ॥ ५५ ॥ 'सुन्दरियो! तुम लुभाकर उन्हें सब प्रकारसे सुख-सुविधाका विश्वास दिलाकर मेरे राज्यमें ले आना।' महाराजकी यह बात सुनते ही वेश्याओंका रंग फीका पड़ गया। वे अचेत-सी हो गयीं। एक ओर तो उन्हें राजाका भय था और दूसरी ओर वे मुनिके शापसे

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