भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 838

हृतोत्तमाङ्गैर्निहतैः करोतु कीर्णां कुशैर्वेदिमिवाध्वरेषु ॥ १८ ॥ गदोल्मुकौ बाहुकभानुनीथाः शूरश्च संख्ये निशठः कुमारः । रणोत्कटौ सारणचारुदेष्णौ कुलोचितं विप्रथयन्तु कर्म ॥ १९ ॥ ढाल-तलवार लिये हुए वीरवर अनिरुद्ध भी, जैसे यज्ञोंमें कुशाओं‌द्वारा यज्ञकी वेदी ढक दी जाती है, उसी प्रकार युद्धमें सिर कटाकर मरे और अचेत पड़े हुए धृतराष्ट्रपुत्रोंद्वारा इस भूमिको ढक दें। गद, उल्मुक, बाहुक, भानु, नीथ, युद्धमें शूरवीर कुमार निशठ तथा रणभूमिमें प्रचण्ड पराक्रमी सारण और चारुदेष्ण—ये सब लोग अपने कुलके अनुरूप पराक्रम प्रकट करें ॥ १८-१९ ॥

सवृष्णिभोजान्धकयोधमुख्या समागता सात्वतशूरसेना । हत्वा रणे तान् धृतराष्ट्रपुत्रां- ल्लोके यशः स्फीतमुपाकरोतु ॥ २० ॥ यदुवंशियोंकी शौर्यपूर्ण सेना, जिसमें वृष्णि, भोज और अन्धकवंशी योद्धाओंकी प्रधानता है, आक्रमण करके युद्धमें धृतराष्ट्रपुत्रोंको मार डाले और संसारमें अपने उज्ज्वल यशका विस्तार करे ॥ २० ॥

ततोऽभिमन्युः पृथिवीं प्रशास्तु यावद् व्रतं धर्मभृतां वरिष्ठः । युधिष्ठिरः पारयते महात्मा द्यूते यथोक्तं कुरुसत्तमेन ॥ २१ ॥ धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महात्मा युधिष्ठिर जबतक अपने उस व्रतको, जिसे इन कुरुकुलभूषणने जूएके समय प्रतिज्ञापूर्वक स्वीकार किया था, पूर्ण न कर लें, तबतक अभिमन्यु इस पृथ्वीका शासन करे ॥ २१ ॥

अस्मत्प्रमुक्तैर्विशिखैर्जितारि- स्ततो महीं भोक्ष्यति धर्मराजः । निर्धार्तराष्ट्रां हतसूतपुत्रा- मेतद्धि नः कृत्यतमं यशस्यम् ॥ २२ ॥ तदनन्तर अपना व्रत समाप्त करके हमारे द्वारा छोड़े हुए बाणोंसे ही शत्रुओंपर विजय पाकर धर्मराज युधिष्ठिर इस पृथ्वीका राज्य भोगेंगे। उस समयतक यह पृथ्वी धृतराष्ट्रके पुत्रोंसे रहित हो जायगी और सूतपुत्र कर्ण भी मर जायगा। यदि ऐसा हुआ तो यह हमारे लिये महान् यशोवर्धक कार्य होगा ॥ २२ ॥