महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 839, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंवासुदेव उवाच
असंशयं माधव सत्यमेतद् गृह्णीम ते वाक्यमदीनसत्त्व । स्वाभ्यां भुजाभ्यामजितां तु भूमिं नेच्छेत् कुरूणामृषभः कथंचित् ॥ २३ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण बोले—उदारहृदय मधुकुलभूषण सात्यके! तुम्हारी यह बात सत्य है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। हम तुम्हारे इन वचनोंको स्वीकार करते हैं; परंतु ये कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर किसी भी ऐसी भूमिको किसी तरह लेना नहीं चाहेंगे, जिसे इन्होंने अपनी भुजाओंद्वारा न जीता हो ॥ २३ ॥
न ह्येष कामान्न भयान्न लोभाद् युधिष्ठिरो जातु जह्यात् स्वधर्मम् । भीमार्जुनौ चातिरथौ यमौ च तथैव कृष्णा द्रुपदात्मजेयम् ॥ २४ ॥ कामना, भय अथवा लोभ किसी भी कारणसे युधिष्ठिर अपना धर्म कदापि नहीं छोड़ सकते। उसी तरह अतिरथी वीर भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा यह द्रुपदकुमारी कृष्णा भी अपना धर्म नहीं छोड़ सकती ॥ २४ ॥
उभौ हि युद्धेऽप्रतिमौ पृथिव्यां वृकोदरश्चैव धनंजयश्च । कस्मान्न कृत्स्नां पृथिवीं प्रशासे- न्माद्रीसुताभ्यां च पुरस्कृतोऽयम् ॥ २५ ॥ भीमसेन और अर्जुन—ये दोनों वीर युद्धमें इस पृथ्वीपर अपना सानी नहीं रखते। इनसे और दोनों माद्रीकुमारोंसे संयुक्त होनेपर ये युधिष्ठिर सारी पृथ्वीका शासन कैसे नहीं कर सकते? ॥ २५ ॥
यदा तु पाञ्चालपतिर्महात्मा सकेकयश्चेदिपतिर्वयं च । युध्येम विक्रम्य रणे समेता- स्तदैव सर्वे रिपवो हि न स्युः ॥ २६ ॥ जब महात्मा पांचालराज, केकय, चेदिराज और हम सब लोग एक साथ होकर रणमें पराक्रम दिखायेंगे, उसी समय हमारे सारे शत्रुओंका अस्तित्व मिट जायगा ॥ २६ ॥
युधिष्ठिर उवाच
नेदं चित्रं माधव यद् ब्रवीषि सत्यं तु मे रक्ष्यतमं न राज्यम् ।