महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 840, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंकृष्णस्तु मां वेद यथावदेकः कृष्णं च वेदाहमथो यथावत् ॥ २७ ॥ युधिष्ठिरने कहा— सात्यके! तुम जो कुछ कह रहे हो वह तुम्हारे-जैसे वीरके लिये कोई आश्चर्यकी बात नहीं है, परंतु मेरे लिये सत्यकी रक्षा ही प्रधान है, राज्यकी प्राप्ति नहीं। केवल श्रीकृष्ण ही मुझे अच्छी तरह जानते हैं और मैं भी कृष्णके स्वरूपको यथार्थ-रूपसे जानता हूँ ॥ २७ ॥
यदैव कालं पुरुषप्रवीरो वेत्स्यत्ययं माधव विक्रमस्य । तदा रणे त्वं च शिनिप्रवीर सुयोधनं जेष्यसि केशवश्च ॥ २८ ॥ शिनिवंशके प्रधान वीर माधव! ये पुरुषरत्न श्रीकृष्ण जभी पराक्रम दिखानेका अवसर आया समझेंगे, तभी तुम और भगवान् केशव मिलकर युद्धमें दुर्योधनको जीत सकोगे ॥ २८ ॥
प्रतिप्रयान्त्वद्य दशार्हवीरा दृष्टोऽस्मि नाथैर्नरलोकनाथैः । धर्मेऽप्रमादं कुरुताप्रमेया द्रष्टास्मि भूयः सुखिनः समेतान् ॥ २९ ॥ अब ये यदुवंशी वीर द्वारकाको लौट जायँ। आपलोग मेरे नाथ या सहायक तो हैं ही, सम्पूर्ण मनुष्य-लोकके भी रक्षक हैं, आपलोगोंसे मिलना हो गया, यह बड़े आनन्दकी बात है। अनुपम शक्तिशाली वीरो! आपलोग धर्मपालनकी ओरसे सदा सावधानी रखें। मैं पुनः आप सभी सुखी मित्रोंको एकत्र हुआ देखूँगा ॥ २९ ॥
तेऽन्योन्यमामन्त्र्य तथाभिवाद्य वृद्धान् परिष्वज्य शिशूंश्च सर्वान् । यदुप्रवीराः स्वगृहाणि जग्मु- स्ते चापि तीर्थान्यनुसंविचेरुः ॥ ३० ॥ तत्पश्चात् वे यादव-पाण्डव वीर एक दूसरेकी अनुमति ले, वृद्धोंको प्रणाम करके, बालकोंको हृदयसे लगाकर तथा अन्य सबसे यथायोग्य मिलकर अपने अभीष्ट स्थानको चल दिये। यादववीर अपने घर गये और पाण्डवलोग पूर्ववत् तीर्थोंमें विचरने लगे ॥ ३० ॥
विसृज्य कृष्णं त्वथ धर्मराजो विदर्भराजोपचितां सुतीर्थाम् । जगाम पुण्यां सरितं पयोष्णीं सभातृभृत्यः सह लोमशेन ॥ ३१ ॥