भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 852

तुम्हारे पिताने इस अत्यन्त बूढ़े पुरुषके साथ तुम्हारा विवाह कैसे कर दिया? भीरु! इस वनमें तुम विद्युत्की भाँति प्रकाशित हो रही हो। भामिनि! देवताओंके यहाँ भी तुम-जैसी सुन्दरीको हम नहीं देख पाते हैं ।। ५-६ ।।

अनाभरणसम्पन्ना परमाम्बरवर्जिता ।
शोभयस्यधिकं भद्रे वनमप्यनलंकृता ।। ७ ।।
'भद्रे! तुम्हारे अंगोंपर आभूषण नहीं है। तुम उत्तम वस्त्रोंसे भी वञ्चित हो और तुमने कोई शृंगार भी नहीं धारण किया है तो भी इस वनकी अधिकाधिक शोभा बढ़ा रही हो ।। ७ ।।

सर्वाभरणसम्पन्ना परमाम्बरधारिणी ।
शोभसे त्वनवद्याङ्गि न त्वेवं मलपङ्किनी ।। ८ ।।
'निर्दोष अंगोंवाली सुन्दरी! यदि तुम समस्त भूषणोंसे भूषित हो जाओ और अच्छे-अच्छे वस्त्र पहन लो तो उस समय तुम्हारी जो शोभा होगी, वैसी इस मल और पंकसे युक्त मलिन वेशमें नहीं हो रही है ।। ८ ।।

कस्मादेवंविधा भूत्वा जराजर्रितं पतिम् ।
त्वमुपास्से ह कल्याणि कामभोगबहिष्कृतम् ।। ९ ।।
'कल्याणि! तुम ऐसी अनुपम सुन्दरी होकर कामभोगसे शून्य इस जरा-जर्जर बूढ़े पतिकी उपासना कैसे करती हो? ।। ९ ।।

असमर्थं परित्राणे पोषणे तु शुचिस्मिते ।
सा त्वं च्यवनमुत्सृज्य वरयस्वैकमावयोः ।। १० ।।
'पवित्र मुसकानवाली देवि! वह बूढ़ा तो तुम्हारी रक्षा और पालन-पोषणमें भी समर्थ नहीं है। अतः तुम च्यवनको छोड़कर हम दोनोंमेंसे किसी एकको अपना पति चुन लो ।। १० ।।

पत्यर्थं देवगर्भाभे मा वृथा यौवनं कृथाः ।
एवमुक्ता सुकन्यापि सुरौ ताविदमब्रवीत् ।। ११ ।।
'देवकन्याके समान सुन्दरी राजकुमारी! बूढ़े पतिके लिये अपनी इस जवानीको व्यर्थ न गँवाओ।' उनके ऐसा कहनेपर सुकन्याने उन दोनों देवताओंसे कहा— ।। ११ ।।

रताहं च्यवने पत्यौ मैवं मां पर्यशङ्कतम् ।
तावब्रूतां पुनस्त्वेनामावां देवभिषग्वरौ ।। १२ ।।
युवानं रूपसम्पन्नं करिष्यावः पतिं तव ।
ततस्तस्यावयोश्चैव वृणीष्वान्यतमं पतिम् ।। १३ ।।
एतेन समयेनैनमामन्त्रय पतिं शुभे ।