महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 853, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें‘देवेश्वरो! मैं अपने पतिदेव च्यवनमुनिमें ही पूर्ण अनुराग रखती हूँ, अतः आप मेरे विषयमें इस प्रकारकी अनुचित आशंका न करें।’ तब उन दोनोंने पुनः सुकन्यासे कहा—‘शुभे! हम देवताओंके श्रेष्ठ वैद्य हैं। तुम्हारे पतिको तरुण और मनोहर रूपसे सम्पन्न बना देंगे। तब तुम हम तीनोंमेंसे किसी एकको अपना पति बना लेना। इस शर्तके साथ तुम चाहो तो अपने पतिको यहाँ बुला लो’ ॥ १२-१३ १/२ ॥
सा तयोर्वचनाद् राजन्नुपसंगम्य भार्गवम् ॥ १४ ॥
उवाच वाक्यं यत् ताभ्यामुक्तं भृगुसुतं प्रति ।
तच्छ्रुत्वा च्यवनो भार्यामुवाच क्रियतामिति ॥ १५ ॥
राजन्! उन दोनोंकी यह बात सुनकर सुकन्या च्यवन मुनिके पास गयी और अश्विनीकुमारोंने जो कुछ कहा था, वह सब उन्हें कह सुनाया। यह सुनकर च्यवनने अपनी पत्नीसे कहा—‘प्रिये! देववैद्योंने जैसा कहा है, वैसा करो’ ॥ १४-१५ ॥
(सा भर्त्रा समनुज्ञाता क्रियतामिति चाब्रवीत् ।
श्रुत्वा तदश्विनौ वाक्यं तस्यास्तत् क्रियतामिति ॥)
ऊचतू राजपत्रीं तां पतिस्तव विशत्वपः ।
ततोऽम्भश्च्यवनः शीघ्रं रूपार्थी प्रविवेश ह ॥ १६ ॥
पतिकी यह आज्ञा पाकर सुकन्याने अश्विनीकुमारोंसे कहा—‘आप मेरे पतिको रूप और यौवनसे सम्पन्न बना दें।’ उसका यह कथन सुनकर अश्विनीकुमारोंने राजकुमारी सुकन्यासे कहा—‘तुम्हारे पतिदेव इस जलमें प्रवेश करें।’ तब च्यवन मुनिने सुन्दर रूपकी अभिलाषा लेकर शीघ्रतापूर्वक उस सरोवरके जलमें प्रवेश किया ॥ १६ ॥
अश्विनावपि तद् राजन् सरः प्राविशतां तदा ।
ततो मुहूर्तादुत्तीर्णाः सर्वे ते सरसस्तदा ॥ १७ ॥
दिव्यरूपधराः सर्वे युवानो मृष्टकुण्डलाः ।
तुल्यवेषधराश्चैव मनसः प्रीतिवर्धनाः ॥ १८ ॥
राजन्! उनके साथ ही दोनों अश्विनीकुमार भी उस सरोवरमें प्रवेश कर गये। तदनन्तर दो घड़ीके पश्चात् वे सब-के-सब दिव्य रूप धारण करके सरोवरसे बाहर निकले। उन सबकी युवावस्था थी। उन्होंने कानोंमें चमकीले कुण्डल धारण कर रखे थे। वेष-भूषा भी उनकी एक-सी ही थी और वे सभी मनकी प्रीति बढ़ानेवाले थे ॥ १७-१८ ॥
तेऽब्रुवन् सहिताः सर्वे वृणीष्वान्यतमं शुभे ।
अस्माकमीप्सितं भद्रे पतित्वे वरवर्णिनि ॥ १९ ॥
सरोवरसे बाहर आकर उन सबने एक साथ कहा—‘शुभे! भद्रे! वरवर्णिनि! हममेंसे किसी एकको जो तुम्हारी रुचिके अनुकूल हो, अपना पति बना लो’ ॥ १९ ॥
यत्र वाप्यभिकामासि तं वृणीष्व सुशोभने ।
सा समीक्ष्य तु तान् सर्वांस्तुल्यरूपधरान् स्थितान् ॥ २० ॥