भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 854, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 854

निश्चित्य मनसा बुद्ध्या देवी वव्रे स्वकं पतिम् । लब्ध्वा तु च्यवनो भार्यां वयो रूपं च वाञ्छितम् ॥ २१ ॥ हृष्टोऽब्रवीन्महातेजास्तौ नासत्याविदं वचः । यथाहं रूपसम्पन्नो वयसा च समन्वितः ॥ २२ ॥ कृतो भवद्भ्यां वृद्धः सन् भार्यां च प्राप्तवानिमाम् । तस्माद् युवां करिष्यामि प्रीत्याहं सोमपीथिनौ । मिषतो देवराजस्य सत्यमेतद् ब्रवीमि वाम् ॥ २३ ॥

‘अथवा शोभने! जिसको भी तुम मनसे चाहती होओ, उसीको पति बनाओ।’ देवी सुकन्याने उन सबको एक-जैसा रूप धारण किये खड़े देख मन और बुद्धिसे निश्चय करके अपने पतिको ही स्वीकार किया। महातेजस्वी च्यवन मुनिने अनुकूल पत्नी, तरुण अवस्था और मनोवाञ्छित रूप पाकर बड़े हर्षका अनुभव किया और दोनों अश्विनीकुमारोंसे कहा—‘आप दोनोंने मुझ बूढ़ेको रूपवान् और तरुण बना दिया, साथ ही मुझे अपनी यह भार्या भी मिल गयी; इसलिये मैं प्रसन्न होकर आप दोनोंको यज्ञमें देवराज इन्द्रके सामने ही सोमपानका अधिकारी बना दूँगा। यह मैं आपलोगोंसे सत्य कहता हूँ’ ॥ २०—२३ ॥

तच्छ्रुत्वा हृष्टमनसौ दिवं तौ प्रतिजग्मतुः ।

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