महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंही होते हैं, प्राणियोंके विकार<sup>३</sup> भी ग्यारह हैं, तथा स्वर्गीय देवताओंमें जो रुद्र<sup>३</sup> कहलाते हैं; उनकी संख्या भी ग्यारह ही है ॥ १८ ॥
अष्टावक्र उवाच
संवत्सरं द्वादशमासमाहु-
र्जगत्याः पादो द्वादशैवाक्षराणि ।
द्वादशाहः प्राकृतो यज्ञ उक्तो
द्वादशादित्यान् कथयन्तीह धीराः ॥ १९ ॥
**अष्टावक्र बोले—**एक संवत्सरमें बारह महीने बताये गये हैं, जगती छन्दका प्रत्येक पाद बारह अक्षरोंका होता है, प्राकृत यज्ञ बारह दिनोंका माना गया है, ज्ञानी पुरुष यहाँ बारह<sup>४</sup> आदित्योंका वर्णन करते हैं ॥ १९ ॥
बन्द्युवाच
त्रयोदशी तिथिरुक्ता प्रशस्ता
त्रयोदशद्वीपवती मही च ।
**बन्दीने कहा—**त्रयोदशी तिथि उत्तम बतायी गयी है तथा यह पृथ्वी तेरह द्वीपोंसे युक्त है।
लोमश उवाच
एतावदुक्त्वा विरराम बन्दी
श्लोकस्यार्धं व्याजहाराष्टावक्रः ।
**लोमशजी कहते हैं—**इतना कहकर बन्दी चुप हो गया। तब शेष आधे श्लोककी पूर्ति अष्टावक्रने इस प्रकार की।
अष्टावक्र उवाच
त्रयोदशाहानि ससार केशी
त्रयोदशादीन्यतिच्छन्दांसि चाहुः ॥ २० ॥
**अष्टावक्र बोले—**केशी नामक दानवने भगवान् विष्णुके साथ तेरह<sup>५</sup> दिनोंतक युद्ध किया था। वेदमें जो अतिशब्द-विशिष्ट छन्द बताये गये हैं, उनका एक-एक पाद तेरह आदि अक्षरोंसे सम्पन्न होता है (अर्थात् अतिजगती छन्दका एक पाद तेरह अक्षरोंका, अतिशक्वरीका एक पाद पन्द्रह अक्षरोंका, अत्यष्टिका प्रत्येक पाद सत्रह अक्षरोंका तथा अतिधृतिका हर एक पाद उन्नीस अक्षरोंका होता है) ॥ २० ॥
ततो महानुदतिष्ठन्निनाद-