भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 918

स्तूष्णींभूतं सूतपुत्रं निशम्य ।

अधोमुखं ध्यानपरं तदानी-

मष्टावक्रं चाप्युदीर्यन्तमेव ॥ २१ ॥

लोमशजी कहते हैं—इतना सुनते ही सूतपुत्र बन्दी चुप हो गया और मुँह

नीचा किये किसी भारी सोच-विचारमें पड़ गया। इधर अष्टावक्र बोलते ही रहे,

यह सब देख दर्शकों और श्रोताओंमें महान् कोलाहल मच गया ॥ २१ ॥

तस्मिंस्तथा संकुले वर्तमाने

स्फीते यज्ञे जनकस्योत राज्ञः ।

अष्टावक्रं पूजयन्तोऽभ्युपेयु-

र्विप्राः सर्वे प्राञ्जलयः प्रतीताः ॥ २२ ॥

महाराज जनकके उस समृद्धिशाली यज्ञमें जबकि चारों ओर कोलाहल

व्याप्त हो रहा था, सब ब्राह्मण हाथ जोड़े हुए श्रद्धापूर्वक अष्टावक्रके समीप

आये और उनका आदर-सत्कारपूर्वक पूजन किया ॥ २२ ॥

अष्टावक्र उवाच

अनेनैव ब्राह्मणाः शुश्रुवांसो

वादे जित्वा सलिले मज्जिताः प्राक् ।

तानेव धर्मानियमद्य बन्दी

प्राप्नोतु गृह्याप्सु निमज्जयैनम् ॥ २३ ॥

तत्पश्चात् अष्टावक्रने कहा—महाराज! इस बन्दीने पहले बहुत-से शास्त्रज्ञ

(विद्वान्) ब्राह्मणोंको शास्त्रार्थमें पराजित करके पानीमें डुबवाया है, अतः इसकी

भी वही गति होनी चाहिये जो इसके द्वारा दूसरोंकी हुई। इसलिये इसे पकड़कर

शीघ्र पानीमें डुबवा दीजिये ॥ २३ ॥

बन्द्युवाच

अहं पुत्रो वरुणस्योत राज्ञ-

स्तत्रास सत्रं द्वादशवार्षिकं वै ।

सत्रेण ते जनक तुल्यकालं

तदर्थं ते प्रहिता मे द्विजाग्रयाः ॥ २४ ॥

बन्दी बोला—महाराज जनक! मैं राजा वरुणका पुत्र हूँ। मेरे पिताके यहाँ

भी आपके इस यज्ञके समान ही बारह वर्षोंमें पूर्ण होनेवाला यज्ञ हो रहा था।

उस यज्ञके अनुष्ठानके लिये ही (जलमें डुबानेके बहाने) कुछ चुने हुए श्रेष्ठ

ब्राह्मणोंको मैंने वरुणलोकमें भेज दिया था ॥ २४ ॥

ते तु सर्वे वरुणस्योत यज्ञं