भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 922

अष्टावक्रः पितरं पूजयित्वा सम्पूजितो ब्राह्मणैस्तैर्यथावत् । प्रत्याजगामाश्रममेव चाग्र्यं जित्वा सौतिं सहितो मातुलेन ॥ ३८ ॥ अष्टावक्र अपने पिताकी पूजा करके स्वयं भी दूसरे ब्राह्मणोंद्वारा यथोचितरूपसे सम्मानित हुए; और इस प्रकार बन्दीपर विजय पाकर पिता एवं मामाके साथ अपने श्रेष्ठ आश्रमपर ही लौट आये ॥ ३८ ॥

ततोऽष्टावक्रमातुरथान्तिके पिता नदीं समङ्गां शीघ्रमिमां विशस्व । प्रोवाच चैनं स तथा विवेश समैरङ्गैश्चापि बभूव सद्यः ॥ ३९ ॥ तदनन्तर पिता कहोडने अष्टावक्रकी माता सुजाताके निकट पुत्र अष्टावक्रसे कहा—'बेटा! तुम शीघ्र ही इस 'समंगा' नदीमें स्नानके लिये प्रवेश करो।' पिताकी आज्ञाके अनुसार उन्होंने उस नदीमें स्नानके लिये प्रवेश किया। उसके जलका स्पर्श होनेपर तत्काल ही उनके सब अंग सीधे हो गये ॥ ३९ ॥

नदी समङ्गा च बभूव पुण्या यस्यां स्नातो मुच्यते किल्बिषाद्धि । त्वमप्येनां स्नानपानावगाहैः सभ्रातृकः सहभार्यो विशस्व ॥ ४० ॥ युधिष्ठिर! इसीसे समंगा नदी पुण्यमयी हो गयी। इसमें स्नान करनेवाला मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। तुम भी स्नान, पान (आचमन) और अवगाहनके लिये अपनी पत्नी और भाइयोंके साथ इस नदीमें प्रवेश करो ॥ ४० ॥

अत्र कौन्तेय सहितो भ्रातृभिस्त्वं सुखोषितः सह विप्रैः प्रतीतः । पुण्यान्यन्यानि शुचिकर्मैकभक्ति- र्मया सार्धं चरितस्याजमीढ ॥ ४१ ॥ अजमीढ़कुलभूषण कुन्तीनन्दन! तुम विश्वासपूर्वक अपने भाइयों और ब्राह्मणोंके साथ यहाँ एक रात सुखसे रहकर कलसे पुनः मेरे साथ पवित्र कर्मोंमें अविचल श्रद्धा-भक्ति रखते हुए दूसरे-दूसरे पुण्यतीर्थोंकी यात्रा करना ॥ ४१ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामष्टावक्रीये चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३४ ॥