भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 923

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अष्टावक्रियोपाख्यानविषयक एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३४ ॥


* यहाँ अष्टावक्रजीने परोक्षरूपमें ही प्रश्नका उत्तर दिया है। भाव यह है कि दो तत्त्व, जिनको वैदिक भाषामें रयि और प्राणके नामसे कहा है (देखिये प्रश्नोपनिषद् १।४) एवं अंग्रेजीमें जिनको पोजिटिव (अनुलोम) और निगेटिव (प्रतिलोम) कहते हैं, स्वभावसे ही संयुक्त रहनेवाले हैं। इनका ही व्यक्त रूप विद्युत्-शक्ति है। उसे गर्भकी भाँति मेघ धारण किये रहता है। संघर्षसे वह प्रकट होती है और आकर्षण होनेपर बाजकी भाँति गिरती है। जहाँ गिरती है वहाँ सबको भस्म कर देती है; इसलिये यह कहा गया कि वह कभी आपके शत्रुओंके घरपर भी न पड़े। इन दो तत्त्वोंकी संयुक्त शक्तिसे ही मेघकी उत्पत्ति होती है। इसलिये यह कहा गया कि उस मेघरूप गर्भको ये उत्पन्न करते हैं।

१- ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ और संन्यास। २- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। ३- पूर्व, दक्षिण, पश्चिम तथा उत्तर। ४- ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत और हल्। ५- परा, पश्यन्ती मध्यमा और वैखरी—ये वाणीके चार पैर हैं। ६- आठ-आठ अक्षरके पाँच पादोंसे पंक्तिछन्दकी सिद्धि होती है। ७- त्वचा, श्रोत्र, नेत्र, रसना और नासिका—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। ८- पंचचूड़ा अप्सराका उल्लेख महाभारतके अनुशासनपर्वमें ३८वें अध्यायमें भी आया है। ९- विपाशा (व्यास), इरावती (रावी), वितस्ता (झेलम), चन्द्रभागा (चिनाव) और शतद्रू (सतलज) ये ही पञ्चनद प्रदेशकी पाँच नदियाँ हैं।

१- हिरन, शूकर, खरगोश, गीदड़ आदि जन्तुओंका ग्रहण मृग नामसे ही हो जाता है। २- सप्तर्षि ये हैं— मरीचिरङ्गिराश्चात्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । वसिष्ठ इति सप्तैते मानसा निर्मिता हि ते ॥ (महा० शान्ति० ३४०।६९) '(भगवान्‌ने स्वयं ब्रह्माजीसे कहा है कि) मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ—ये सातों महर्षि तुम्हारे (ब्रह्माजीके) द्वारा ही अपने मनसे रचे हुए हैं।'

३- धरो ध्रुवश्च सोमश्च अहश्चैवानिलोऽनलः । प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः ॥ (महा० आदि० ६६।१८) 'धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास—ये आठ वसु कहे गये हैं।'

४- यथा रोगी, दरिद्र, शोकार्त, राजदण्डित, शठ, खल, वृत्तिसे वंचित, उन्मत्त, ईर्ष्यापरायण और कामी —ये दस निन्दक होते हैं। जैसा कि निम्नांकित श्लोकसे सिद्ध होता है—'आमयी दुर्मतः शोकी दण्डितश्च शठः खलः । नष्टवृत्तिर्मदी चेर्ष्या कामी च दश निन्दकाः ॥' (इति नीतिशास्त्रोक्तिः) ५- उन दसों अवस्थाओंके नाम इस प्रकार हैं—गर्भवास, जन्म, बाल्य, कौमार, पौगण्ड, कैशोर, यौवन, प्रौढ़, वार्द्धक्य तथा मृत्यु। ६- अध्यापक, पिता, ज्येष्ठ भ्राता, राजा, मामा, श्वशुर, नाना, दादा, अपनेसे बड़ी अवस्थावाले कुटुम्बी तथा पितृव्य (चाचा-ताऊ)—ये दस पूजनीय पुरुष माने गये हैं। जैसा कि कूर्मपुराणका वचन है—उपाध्यायः पिता ज्येष्ठभ्राता चैव महीपतिः । मातुलः श्वशुरश्चैव मातामहपितामहौ ॥ बन्धुर्जेष्ठः पितृव्यश्च पुंस्येते गुरवो मताः ॥

१- वाक्य बोलना, ग्रहण करना, चलना-फिरना, मलत्याग करना और मैथुनजनित सुखका अनुभव करना—ये पाँच कर्मेन्द्रियोंके विषय हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके विषय हैं और इन सबका मनन—मनका विषय है। इस प्रकार कुल मिलाकर ग्यारह विषय हैं। २- काम-क्रोध, लोभ-मोह, मद-मत्सर, हर्ष-शोक, राग-द्वेष और अहंकार—ये ग्यारह विकार होते हैं। ३- एकादश रुद्र ये हैं— मृगव्याधश्च सर्पश्च निर्ऋतिश्च महायशाः । अजैकपादहिर्बुध्न्यः पिनाकी च परंतपः ॥ दहनोऽथेश्वरश्चैव कपाली च महाद्युतिः । स्थाणुर्भवश्च भगवान् रुद्रा एकादश स्मृताः ॥