महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 931, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंस लब्धकामः पितरं समेत्याथेदमब्रवीत् ॥ ४२ ॥ लोमशजी कहते हैं— राजन्! तब इन्द्रने महातपस्वी यवक्रीतके कथनानुसार उन्हें वर देते हुए कहा—'यवक्रीत! तुम्हारे पितासहित तुम्हें वेदोंका यथेष्ट ज्ञान प्राप्त हो जायगा। साथ ही और भी जो तुम्हारी कामना हो, वह पूर्ण हो जायगी। अब तुम तपस्या छोड़कर अपने आश्रमको लौट जाओ।' इस प्रकार पूर्णकाम होकर, यवक्रीत अपने पिताके पास गये और इस प्रकार बोले ॥ ४१-४२ ॥
यवक्रीत उवाच
प्रतिभास्यन्ति वै वेदा मम तातस्य चोभयोः । अति चान्यान् भविष्यावो वरा लब्धास्तदा मया ॥ ४३ ॥ यवक्रीतने कहा— पिताजी! आपको और मुझे दोनोंको ही सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञान हो जायगा। साथ ही हम दोनों दूसरोंसे ऊँची स्थितिमें हो जायँगे—ऐसा वर मैंने प्राप्त किया है ॥ ४३ ॥
भरद्वाज उवाच
दर्पस्ते भविता तात वराँल्लब्ध्वा यथेप्सितान् । स दर्पपूर्णः कृपणः क्षिप्रमेव विनङ्क्ष्यसि ॥ ४४ ॥ भरद्वाज बोले— तात! इस तरह मनोवाञ्छित वर प्राप्त करनेके कारण तुम्हारे मनमें अहंकार उत्पन्न हो जायगा और अहंकारसे युक्त होनेपर तुम कृपण होकर शीघ्र ही नष्ट हो जाओगे ॥ ४४ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीमा गाथा देवैरुदाहृताः । मुनिरासीत् पुरा पुत्र बालधिर्नाम वीर्यवान् ॥ ४५ ॥ इस विषयमें विज्ञजन देवताओंकी कही हुई यह गाथा सुनाया करते हैं—प्राचीनकालमें बालधि नामसे प्रसिद्ध एक शक्तिशाली मुनि थे ॥ ४५ ॥
स पुत्रशोकादुद्विग्नस्तपस्तेपे सुदुष्करम् । भवेन्मम सुतोऽमर्त्य इति तं लब्धवांश्च सः ॥ ४६ ॥ उन्होंने पुत्रशोकसे संतप्त होकर अत्यन्त कठोर तपस्या की। तपस्याका उद्देश्य यह था कि मुझे देवोपम पुत्र प्राप्त हो। अपनी उस अभिलाषाके अनुसार बालधिको एक पुत्र प्राप्त हुआ ॥ ४६ ॥
तस्य प्रसादो वै देवैः कृतो न त्वमरैः समः । नामर्त्यो विद्यते मर्त्यो निमित्तायुर्भविष्यति ॥ ४७ ॥ देवताओंने उनपर कृपा अवश्य की, परंतु उनके पुत्रको देवतुल्य नहीं बनाया और वरदान देते हुए यह कहा 'कि मरणधर्मा मनुष्य कभी देवताके समान अमर नहीं हो सकता। अतः उसकी आयु निमित्त (कारण)-के अधीन होगी' ॥ ४७ ॥