महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 932, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालधिरुवाच
यथेमे पर्वताः शश्वत् तिष्ठन्ति सुरसत्तमाः । अक्षयास्तन्निमित्तं मे सुतस्यायुर्भविष्यति ॥ ४८ ॥ बालधि बोले—देववरो! जैसे ये पर्वत सदा अक्षयभावसे खड़े रहते हैं, वैसे ही मेरा पुत्र भी सदा अक्षय बना रहे। ये पर्वत ही उसकी आयुके निमित्त होंगे अर्थात् जबतक ये पर्वत यहाँ बने रहें तबतक मेरा पुत्र भी जीवित रहे ॥ ४८ ॥
भरद्वाज उवाच
तस्य पुत्रस्तदा जज्ञे मेधावी क्रोधनस्तदा । स तच्छ्रुत्वाकरोद् दर्पमृषींश्चैवावमन्यत ॥ ४९ ॥ भरद्वाज कहते हैं—यवक्रीत! तदनन्तर बालधिके पुत्रका जन्म हुआ, जो मेधायुक्त होनेके कारण मेधावी नामसे विख्यात था। वह स्वभावका बड़ा क्रोधी था। अपनी आयुके विषयमें देवताओंके वरदानकी बात सुनकर मेधावी घमण्डमें भर गया और ऋषियोंका अपमान करने लगा ॥ ४९ ॥
विकुर्वाणो मुनीनां च व्यचरत् स महीमिमाम् । आससाद महावीर्यं धनुषाक्षं मनीषिणम् ॥ ५० ॥ इतना ही नहीं, वह ऋषि-मुनियोंको सतानेके उद्देश्यसे ही इस पृथ्वीपर सब ओर विचरा करता था। एक दिन मेधावी महान् शक्तिशाली एवं मनीषी धनुषाक्षके पास जा पहुँचा ॥ ५० ॥
तस्यापचक्रे मेधावी तं शशाप स वीर्यवान् । भव भस्मेति चोक्तः स न भस्म समपद्यत ॥ ५१ ॥ और उनका तिरस्कार करने लगा। तब तपोबल-सम्पन्न ऋषि धनुषाक्षने उसे शाप देते हुए कहा—'अरे, तू जलकर भस्म हो जा।' परंतु उनके कहनेपर भी वह भस्म नहीं हुआ ॥ ५१ ॥
धनुषाक्षस्तु तं दृष्ट्वा मेधाविनमनामयम् । निमित्तमस्य महिषैर्भेदयामास वीर्यवान् ॥ ५२ ॥ शक्तिशाली धनुषाक्षने ध्यानमें देखा कि मेधावी रोग एवं मृत्युसे रहित है। तब उसकी आयुके निमित्तभूत पर्वतोंको उन्होंने भैंसोंद्वारा विदीर्ण करा दिया ॥ ५२ ॥
स निमित्ते विनष्टे तु ममार सहसा शिशुः । तं मृतं पुत्रमादाय विललाप ततः पिता ॥ ५३ ॥ निमित्तका नाश होते ही उस मुनिकुमारकी सहसा मृत्यु हो गयी। तदनन्तर पिता उस मरे हुए पुत्रको लेकर अत्यन्त विलाप करने लगे ॥ ५३ ॥
लालप्यमानं तं दृष्ट्वा मुनयः परमार्तवत् ।