भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 933

ऊचुर्वेदविदः सर्वे गाथां यां तां निबोध मे ।। ५४ ।। अधिक पीड़ित मनुष्योंकी भाँति उन्हें विलाप करते देख वहाँके समस्त वेदवेत्ता मुनिगण एकत्र हो जिस गाथाको गाने लगे, उसे बताता हूँ, सुनो ।। ५४ ।।

न दिष्टमर्थमत्येतुमीशो मर्त्यः कथंचन । महिषैर्भेदयामास धनुषाक्षो महीधरान् ।। ५५ ।। 'मरणधर्मा मनुष्य किसी तरह दैवके विधानका उल्लंघन नहीं कर सकता, तभी तो धनुषाक्षने उस बालककी आयुके निमित्तभूत पर्वतोंका भैसोंद्वारा भेदन करा दिया' ।। ५५ ।।

एवं लब्ध्वा वरान् बाला दर्पपूर्णास्तपस्विनः । क्षिप्रमेव विनश्यन्ति यथा न स्यात् तथा भवान् ।। ५६ ।। इस प्रकार बालक तपस्वी वर पाकर घमण्डमें भर जाते हैं और (अपने दुर्व्यवहारोंके कारण) शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। तुम्हारी भी यही अवस्था न हो (इसलिये सावधान किये देता हूँ) ।। ५६ ।।

एष रैभ्यो महावीर्यः पुत्रौ चास्य तथाविधौ । तं यथा पुत्र नाभ्येषि तथा कुर्यास्त्वतन्द्रितः ।। ५७ ।। ये रैभ्यमुनि महान् शक्तिशाली हैं। इनके दोनों पुत्र भी इन्हींके समान हैं। बेटा! तुम उन रैभ्यमुनिके पास कदापि न जाना और आलस्य छोड़कर इसके लिये सदा प्रयत्नशील रहना ।। ५७ ।।

स हि क्रुद्धः समर्थस्त्वां पुत्र पीडयितुं रुषा । रैभ्यश्चापि तपस्वी च कोपनश्च महानृषिः ।। ५८ ।। बेटा! तुम्हें सावधान करनेका कारण यह है कि शक्तिशाली तपस्वी महर्षि रैभ्य बड़े क्रोधी हैं। वे कुपित होकर रोषसे तुम्हें पीड़ा दे सकते हैं ।। ५८ ।।

यवक्रीत उवाच

एवं करिष्ये मा तापं तात कार्षीः कथंचन । यथा हि मे भवान् मान्यस्तथा रैभ्यः पिता मम ।। ५९ ।। यवक्रीत बोले—पिताजी! मैं ऐसा ही करूँगा, आप किसी तरह मनमें संताप न करें। जैसे आप मेरे माननीय हैं, वैसे रैभ्यमुनि मेरे लिये पिताके समान हैं ।। ५९ ।।

लोमश उवाच

उक्त्वा स पितरं श्लक्ष्णं यवक्रीरकुतोभयः । विप्रकुर्वन्नृषीनन्यानतुष्यत् परया मुदा ।। ६० ।। लोमशजी कहते हैं—युधिष्ठिर! पितासे यह मीठी बातें कहकर यवक्रीत निर्भय विचरने लगे। दूसरे ऋषियोंको सतानेमें उन्हें अधिक सुख मिलता था। वैसा करके वे बहुत