महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 957, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीर्थानि चैव रम्याणि वनानि च सरांसि च । चरामि सह युष्माभिस्तस्य दर्शनकाङ्क्षया ॥ ६ ॥ अर्जुनको देखनेकी ही अभिलाषासे मैं तुमलोगोंके साथ विभिन्न तीर्थोंमें, रमणीय वनोंमें और सुन्दर सरोवरोंके तटपर विचर रहा हूँ ॥ ६ ॥ पञ्चवर्षाण्यहं वीरं सत्यसंधं धनंजयम् । यन्न पश्यामि बीभत्सुं तेन तप्ये वृकोदर ॥ ७ ॥ भीमसेन! आज पाँच वर्ष हो गये, मैं अपने वीर भाई सत्यप्रतिज्ञ अर्जुनके दर्शनसे वंचित हो गया हूँ। इसके कारण मुझे बड़ी चिन्ता हो रही है ॥ ७ ॥ तं वै श्यामं गुडाकेशं सिंहविक्रान्तगामिनम् । न पश्यामि महाबाहुं तेन तप्ये वृकोदर ॥ ८ ॥ वृकोदर! सिंहके समान मस्तानी चालसे चलनेवाले, निद्राविजयी, श्यामवर्ण, महाबाहु अर्जुनको नहीं देख पा रहा हूँ, इसलिये मेरे मनमें बड़ा संताप हो रहा है ॥ ८ ॥ कृतास्त्रं निपुणं युद्धेऽप्रतिमानं धनुष्मताम् । न पश्यामि कुरुश्रेष्ठ तेन तप्ये वृकोदर ॥ ९ ॥ कुरुश्रेष्ठ भीमसेन! अस्त्रविद्यामें प्रवीण, युद्धकुशल और अनुपम धनुर्धर उस अर्जुनको नहीं देखता हूँ, इस कारण मुझे बड़ा कष्ट होता है ॥ ९ ॥ चरन्तमरिसंघेषु काले क्रुद्धमिवान्तकम् । प्रभिन्नमिव मातङ्गं सिंहस्कन्धं धनंजयम् ॥ १० ॥ जो युद्धके समय शत्रुओंके समूहमें कुपित यमराजकी भाँति विचरता है, जिसके कंधे सिंहके समान हैं तथा जो मदकी धारा बहानेवाले मत्त गजराजके समान शोभा पाता है, उस वीर धनंजयसे अबतक भेंट न हो सकी; इसका मुझे बड़ा दुःख है ॥ १० ॥ यः स शक्रादनवरो वीर्येण द्रविणेन च । यमयोः पूर्वजः पार्थः श्वेताश्वोऽमितविक्रमः ॥ ११ ॥ दुःखेन महताविष्टस्तं न पश्यामि फाल्गुनम् । अजेयमुग्रधन्वानं तेन तप्ये वृकोदर ॥ १२ ॥ वृकोदर! जो पराक्रम और सम्पत्तिमें देवराज इन्द्रसे तनिक भी कम नहीं है, जिसके रथके घोड़े श्वेत रंगके हैं, जो नकुल-सहदेवसे अवस्थामें बड़ा है, जिसके पराक्रमकी कोई सीमा नहीं है तथा जो उग्र धनुर्धर एवं अजेय है, उस वीरवर अर्जुनके दर्शनसे मैं वंचित हूँ; इसके लिये मुझे महान कष्ट हो रहा है। मैं चिन्ताकी आगमें जला जा रहा हूँ ॥ ११-१२ ॥ सततं यः क्षमाशीलः क्षिप्यमाणोऽप्यणीयसा । ऋजुमार्गप्रपन्नस्य शर्मदाताभयस्य च ॥ १३ ॥ स तु जिह्मप्रवृत्तस्य माययाभिजिघांसतः । अपि वज्रधरस्यापि भवेत् कालविषोपमः ॥ १४ ॥