भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 958

जो छोटे लोगोंके आक्षेप करनेपर भी सदा क्षमाशील होनेके कारण उस आक्षेपको सह लेता है तथा सरल मार्गसे अपनी शरणमें आनेवाले लोगोंको सुख पहुँचाकर उन्हें अभयदान देता है, वही अर्जुन, जब कोई कुटिल मार्गका आश्रय ले छल-कपटसे उसपर आघात करना चाहता है तब वह वज्रधारी इन्द्र ही क्यों न हो, उसके लिये काल और विषके समान भयंकर हो जाता है ।। १३-१४ ।।

शत्रोरपि प्रपन्नस्य सोऽनृशंसः प्रतापवान् । दाताभयस्य बीभत्सुरमितात्मा महाबलः ।। १५ ।। सर्वेषामाश्रयोऽस्माकं रणेऽरीणां प्रमर्दिता । आहर्ता सर्वरत्नानां सर्वेषां नः सुखावहः ।। १६ ।। यदि शत्रु भी शरणमें आ जाय तो वह प्रतापी वीर उसके प्रति दयालु हो जाता और उसे निर्भय कर देता है। वह महाबली महामना अर्जुन ही हमलोगोंका सहारा है। वही समरांगणमें हमारे शत्रुओंको रौंद डालनेकी शक्ति रखता है। उसीने हमारे लिये सब प्रकारके रत्न लाकर सुलभ किये थे और वही हम सबको सदा सुख पहुँचानेवाला है ।। १५-१६ ।।

रत्नानि यस्य वीर्येण दिव्याण्यासन् पुरा मम । बहूनि बहुजातीनि यानि प्राप्तः सुयोधनः ।। १७ ।। जिसके पराक्रमसे हमारे पास पहले अनेक प्रकारकी असंख्य रत्नराशि संचित हो गयी थी, जिसे सुयोधनने ले लिया ।। १७ ।।

यस्य बाहुबलाद् वीर सभा चासीत् पुरा मम । सर्वरत्नमयी ख्याता त्रिषु लोकेषु पाण्डव ।। १८ ।। वीर भीमसेन! जिसके बाहुबलसे पहले मेरे अधिकारमें सम्पूर्ण रत्नोंकी बनी हुई त्रिभुवनविख्यात सभा थी ।। १८ ।।

वासुदेवसमं वीर्ये कार्तवीर्यसमं युधि । अजेयममितं युद्धे तं न पश्यामि फाल्गुनम् ।। १९ ।। जो पराक्रममें भगवान् श्रीकृष्ण और युद्धमें कार्तवीर्य अर्जुनके समान है; तथा जो समरभूमिमें एक होकर भी असंख्य-सा प्रतीत होता है, उस अजेय वीर अर्जुनको मैं बहुत दिनोंसे नहीं देख पाता हूँ ।। १९ ।।

संकर्षणं महावीर्यं त्वां च भीमापराजितम् । अनुयातः स्ववीर्येण वासुदेवं च शत्रुहा ।। २० ।। भीमसेन! शत्रुनाशक अर्जुन अपने पराक्रमसे महाबली बलरामकी, तुझ अपराजित वीरकी और वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णकी समानता कर सकता है ।। २० ।।

यस्य बाहुबले तुल्यः प्रभावे च पुरंदरः । जवे वायुर्मुखे सोमः क्रोधे मृत्युः सनातनः ।। २१ ।। ते वयं तं नरव्याघ्रं सर्वे वीर दिदृक्षवः ।