भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 96

जनेश्वर! इस विषयमें मैं तुम्हें एक परम उत्तम इतिहास सुनाता हूँ; जो सुरभि तथा इन्द्रके संवादके रूपमें है ।। ६ ।। त्रिविष्टपगता राजन् सुरभी प्रारुदत् किल । गवां माता पुरा तात तामिन्द्रोऽन्वकृपायत ।। ७ ।। राजन्! पहलेकी बात है, गोमाता सुरभि स्वर्गलोकमें जाकर फूट-फूटकर रोने लगी। तात! उस समय इन्द्रको उसपर बड़ी दया आयी ।। ७ ।।

इन्द्र उवाच किमिदं रोदिषि शुभे कच्चित् क्षेमं दिवौकसाम् । मानुषेष्वथ वा गोषु नैतदल्पं भविष्यति ।। ८ ।। इन्द्रने पूछा—शुभे! तुम क्यों इस तरह रो रही हो? देवलोकवासियोंकी कुशल तो है न? मनुष्यों तथा गौओंमें तो सब लोग कुशलसे हैं न? तुम्हारा यह रोदन किसी अल्प कारणसे नहीं हो सकता? ।। ८ ।।

सुरभिरुवाच विनिपातो न वः कश्चिद् दृश्यते त्रिदशाधिप । अहं तु पुत्रं शोचामि तेन रोदिमि कौशिक ।। ९ ।। सुरभिने कहा—देवेश्वर! आपलोगोंकी अवनति नहीं दिखायी देती। इन्द्र! मुझे तो अपने पुत्रके लिये शोक हो रहा है, इसीसे रोती हूँ ।। ९ ।। पश्यैनं कर्षकं क्षुद्रं दुर्बलं मम पुत्रकम् । प्रतोदेनाभिनिघ्नन्तं लाङ्गलेन च पीडितम् ।। १० ।। देखो, इस नीच किसानको जो मेरे दुर्बल बेटेको बार-बार कोड़ेसे पीट रहा है और वह हलसे जुतकर अत्यन्त पीड़ित हो रहा है ।। १० ।। निषीदमानं सोत्कण्ठं वध्यमानं सुराधिप । कृपाविष्टास्मि देवेन्द्र मनश्चोद्विजते मम । एकस्तत्र बलोपेतो धुरमुद्वहतेऽधिकाम् ।। ११ ।। अपरोऽप्यबलप्राणः कृशो धमनिसंततः । कृच्छ्रादुद्वहते भारं तं वै शोचामि वासव ।। १२ ।। वध्यमानः प्रतोदेन तुद्यमानः पुनः पुनः । नैव शक्नोति तं भारमुद्वोढुं पश्य वासव ।। १३ ।। सुरेश्वर! वह तो विश्रामके लिये उत्सुक होकर बैठ रहा है और वह किसान उसे डंडे मारता है। देवेन्द्र! यह देखकर मुझे अपने बच्चेके प्रति बड़ी दया हो आयी है और मेरा मन उद्विग्न हो उठा है। वहाँ दो बैलोंमेंसे एक तो बलवान् है जो भारयुक्त जूएको खींच सकता है; परंतु दूसरा निर्बल है, प्राणशून्य-सा जान पड़ता है। वह इतना दुबला-पतला हो गया है