भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 97

कि उसके सारे शरीरमें फैली हुई नाड़ियाँ दीख रही हैं। वह बड़े कष्टसे उस भारयुक्त जूएको खींच पाता हैं। वासव! मुझे उसीके लिये शोक हो रहा है। इन्द्र! देखो-देखो, चाबुकसे मार-मारकर उसे बार-बार पीड़ा दी जा रही है, तो भी उस जूएके भारको वहन करनेमें वह असमर्थ हो रहा है ।। ११—१३ ।। ततोऽहं तस्य शोकार्ता विरौमि भृशदुःखिता । अश्रूण्यावर्तयन्ती च नेत्राभ्यां करुणायती ।। १४ ।। यही देखकर मैं शोकसे पीड़ित हो अत्यन्त दुःखी हो गयी हूँ और करुणामग्न हो दोनों नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई रो रही हूँ ।। १४ ।।

शक्र उवाच तव पुत्रसहस्रेषु पीड्यमानेषु शोभने । किं कृपायितवत्यत्र पुत्र एकत्र हन्यति ।। १५ ।। इन्द्रने कहा— कल्याणी! तुम्हारे तो सहस्रों पुत्र इसी प्रकार पीड़ित हो रहे हैं, फिर तुमने एक ही पुत्रके मार खानेपर यहाँ इतनी करुणा क्यों दिखायी? ।। १५ ।।

सुरभिरुवाच यदि पुत्रसहस्राणि सर्वत्र समतैव मे । दीनस्य तु सतः शक्र पुत्रस्याभ्यधिका कृपा ।। १६ ।। सुरभि बोली— देवेन्द्र! यदि मेरे सहस्रों पुत्र हैं, तो मैं उन सबके प्रति समानभाव ही रखती हूँ; परंतु दीन-दुःखी पुत्रके प्रति अधिक दया उमड़ आती है ।। १६ ।।

व्यास उवाच तदिन्द्रः सुरभीवाक्यं निशम्य भृशविस्मितः । जीवितेनापि कौरव्य मेनेऽभ्यधिकमात्मजम् ।। १७ ।। व्यासजी कहते हैं— कुरुराज! सुरभिकी यह बात सुनकर इन्द्र बड़े विस्मित हो गये। तबसे वे पुत्रको प्राणोंसे भी अधिक प्रिय मानने लगे ।। १७ ।। प्रववर्ष च तत्रैव सहसा तोयमुल्बणम् । कर्षकस्याचरन् विघ्नं भगवान् पाकशासनः ।। १८ ।। उस समय वहाँ पाकशासन भगवान् इन्द्रने किसानके कार्यमें विघ्न डालते हुए सहसा भयंकर वर्षा की ।। १८ ।। तद् यथा सुरभिः प्राह समवेतास्तु ते तथा । सुतेषु राजन् सर्वेषु हीनेष्वभ्यधिका कृपा ।। १९ ।। इस प्रसंगमें सुरभिने जैसा कहा है, वह ठीक है, कौरव और पाण्डव सभी मिलकर तुम्हारे ही पुत्र हैं। परंतु राजन्! सब पुत्रोंमें जो हीन हों, दयनीय दशामें पड़े हों, उन्हींपर