महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 964, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें'उस समय सभी देवताओं तथा ऋषियोंने उनकी स्तुति की। उन्हें देखते ही प्रज्वलित कान्तिसे सुशोभित भगवान् अग्निदेवका तेज नष्ट-सा हो गया। वे श्रीहरिके तेजसे तिरस्कृत हो गये। समस्त देवसमुदायके स्वामी एवं वरदायक भगवान् विष्णुका दर्शन करके वज्रधारी इन्द्रने उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और बार-बार मस्तक झुकाया। तदनन्तर वे सारी बातें भगवान्से कह सुनायीं, जिनके कारण उन्हें उस दैत्यसे भय हो रहा था' ।। २२—२४ ।।
विष्णुरुवाच जानामि ते भयं शक्र दैत्येन्द्रान्नरकात् ततः । ऐन्द्रं प्रार्थयते स्थानं तपःसिद्धेन कर्मणा ॥ २५ ॥ **तब भगवान् विष्णुने कहा—**इन्द्र! मैं जानता हूँ, तुम्हें दैत्यराज नरकासुरसे भय प्राप्त हुआ है। वह अपने तपःसिद्ध कर्मोंद्वारा इन्द्रपदको लेना चाहता है ।। २५ ।।
सोऽहमेनं तव प्रीत्या तपःसिद्धमपि ध्रुवम् । वियुनज्मि देहाद् देवेन्द्र मुहूर्तं प्रतिपालय ॥ २६ ॥
देवेन्द्र! यद्यपि तपस्याद्वारा उसे सिद्धि प्राप्त हो चुकी है तो भी मैं तुम्हारे प्रेमवश निश्चय ही उस दैत्यको मार डालूँगा, तुम थोड़ी देर और प्रतीक्षा करो ।। २६ ।।
तस्य विष्णुर्महातेजाः पाणिना चेतनां हरत् । स पपात ततो भूमौ गिरिराज इवाहतः ॥ २७ ॥