महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 965, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंऐसा कहकर महातेजस्वी भगवान् विष्णुने हाथसे मारकर उस दैत्यके प्राण हर लिये और वह वज्रके मारे हुए गिरिराजकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २७ ॥ तस्यैतदस्थिसंघातं मायाविनिहतस्य वै । इदं द्वितीयमपरं विष्णोः कर्म प्रकाशते ॥ २८ ॥ इस प्रकार मायाद्वारा मारे गये उस दैत्यकी हड्डियोंका यह समूह दिखायी देता है। अब मैं भगवान् विष्णुका यह दूसरा पराक्रम बता रहा हूँ, जो सर्वत्र प्रकाशमान है ॥ २८ ॥ नष्टा वसुमती कृत्स्ना पाताले चैव मज्जिता । पुनरुद्धरिता तेन वाराहेणैकशृङ्गिणा ॥ २९ ॥ एक समय सारी पृथ्वी एकार्णवके जलमें डूबकर अदृश्य हो गयी, पातालमें डूब गयी। उस समय भगवान् विष्णुने पर्वतशिखरके सदृश एक दाँतवाले वाराहका रूप धारण करके पुनः इसका उद्धार किया था ॥ २९ ॥
युधिष्ठिर उवाच
भगवन् विस्तरेणेमां कथां कथय तत्त्वतः । कथं तेन सुरेशेन नष्टा वसुमती तदा ॥ ३० ॥ योजनानां शतं ब्रह्मन् पुनरुद्धरिता तदा । केन चैव प्रकारेण जगतो धरणी ध्रुवा ॥ ३१ ॥ **युधिष्ठिरने पूछा—**भगवन्! देवेश्वर भगवान् विष्णुने पातालमें सैकड़ों योजन नीचे डूबी हुई इस पृथ्वीका पुनरुद्धार किस प्रकार किया? आप इस कथाको यथार्थरूपसे और विस्तारपूर्वक कहिये। जगत्का भार धारण करनेवाली इस अचला पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये उन्होंने किस उपायका अवलम्बन किया? ॥ ३०-३१ ॥ शिवा देवी महाभागा सर्वसस्यप्ररोहिणी । कस्य चैव प्रभावाद्धि योजनानां शतं गता ॥ ३२ ॥ सम्पूर्ण शस्योंका उत्पादन करनेवाली यह कल्याणमयी महाभागा वसुधादेवी किसके प्रभावसे सैकड़ों योजन नीचे धँस गयी थी ॥ ३२ ॥ केन तद् वीर्यसर्वस्वं दर्शितं परमात्मनः । एतत् सर्वं यथातत्त्वमिच्छामि द्विजसत्तम । श्रोतुं विस्तरशः सर्वं त्वं हि तस्य प्रतिश्रयः ॥ ३३ ॥ परमात्माके उस अद्भुत पराक्रमका दर्शन (ज्ञान) किसने कराया था? द्विजश्रेष्ठ! यह सब मैं यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। आप इस वृत्तान्तके आश्रय (ज्ञाता) हैं ॥ ३३ ॥
लोमश उवाच
यत् तेऽहं परिपृष्टोऽस्मि कथामेतां युधिष्ठिर ।