महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 966, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत् सर्वमखिलेनेह श्रूयतां मम भाषतः ॥ ३४ ॥ लोमशजीने कहा— युधिष्ठिर! तुमने जिसके विषयमें मुझसे प्रश्न किया है, वह कथा—वह सारा वृत्तान्त मैं बता रहा हूँ, सुनो ॥ ३४ ॥ पुरा कृतयुगे तात वर्तमाने भयंकरे । यमत्वं कारयामास आदिदेवः पुरातनः ॥ ३५ ॥ तात! इस कल्पके प्रथम सत्ययुगकी बात है, एक समय बड़ी भयंकर परिस्थिति उत्पन्न हो गयी थी। उस समय आदिदेव पुरातन पुरुष भगवान् श्रीहरि ही यमराजका भी कार्य सम्पन्न करते थे ॥ ३५ ॥ यमत्वं कुर्वतस्तस्य देवदेवस्य धीमतः । न तत्र म्रियते कश्चिज्जायते वा तथाप्युत ॥ ३६ ॥ युधिष्ठिर! परम बुद्धिमान् देवदेव भगवान् श्रीहरिके यमराजका कार्य सँभालते समय किसी भी प्राणीकी मृत्यु नहीं होती थी; परंतु उत्पत्तिका कार्य पूर्ववत् चलता रहा ॥ वर्धन्ते पक्षिसंघाश्च तथा पशुगवेडकम् । गवाश्वं च मृगाश्चैव सर्वे ते पिशिताशनाः ॥ ३७ ॥ फिर तो पक्षियोंके समूह बढ़ने लगे। गाय, बैल, भेड़-बकरे आदि पशु, घोड़े, मृग तथा मांसाहारी जीव सभी बढ़ने लगे ॥ ३७ ॥ तथा पुरुषशार्दूल मानुषाश्च परंतप । सहस्रशो ह्ययुतशो वर्धन्ते सलिलं यथा ॥ ३८ ॥ शत्रुओंको संताप देनेवाले नरश्रेष्ठ! जैसे बरसातमें पानी बढ़ता है, उसी प्रकार मनुष्य भी हजार एवं दस हजार गुनी संख्यामें बढ़ने लगे ॥ ३८ ॥ एतस्मिन् संकुले तात वर्तमाने भयंकरे । अतिभाराद् वसुमती योजनानां शतं गता ॥ ३९ ॥ तात! इस प्रकार सब प्राणियोंकी वृद्धि होनेसे जब बड़ी भयंकर अवस्था आ गयी तब अत्यन्त भारसे दबकर यह पृथ्वी सैकड़ों योजन नीचे चली गयी ॥ ३९ ॥ सा वै व्यथितसर्वाङ्गी भारेणाक्रान्तचेतना । नारायणं वरं देवं प्रपन्ना शरणं गता ॥ ४० ॥ भारी भारके कारण पृथ्वी देवीके सम्पूर्ण अंगोंमें बड़ी पीड़ा हो रही थी। उसकी चेतना लुप्त होती जा रही थी। अतः वह सर्वश्रेष्ठ देवता भगवान् नारायणकी शरणमें गयी ॥ ४० ॥
पृथिव्युवाच भगवंस्त्वत्प्रसादाद्धि तिष्ठेयं सुचिरं त्विह । भारेणास्मि समाक्रान्ता न शक्नोमि स्म वर्तितुम् ॥ ४१ ॥