भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 967, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 967

पृथ्वी बोली— भगवन्! आप ऐसी कृपा करें जिससे मैं दीर्घ कालतक यहाँ स्थिर रह सकूँ। इस समय मैं भारसे इतनी दब गयी हूँ कि जीवन धारण नहीं कर सकती ॥ ४१ ॥ ममेमं भगवन् भारं व्यपनेतुं त्वमर्हसि । शरणागतास्मि ते देव प्रसादं कुरु मे विभो ॥ ४२ ॥ भगवन्! मेरे इस भारको आप दूर करनेकी कृपा करें। देव! मैं आपकी शरणमें आयी हूँ। विभो! मुझपर कृपाप्रसाद कीजिये ॥ ४२ ॥ तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा भगवानक्षरः प्रभुः । प्रोवाच वचनं हृष्टः श्रव्याक्षरसमीरितम् ॥ ४३ ॥ पृथ्वीका यह वचन सुनकर अविनाशी भगवान् नारायणने प्रसन्न होकर श्रवणमधुर अक्षरोंसे युक्त मीठी वाणीमें कहा ॥ ४३ ॥

विष्णुरुवाच न ते महि भयं कार्यं भारार्ते वसुधारिणि । अहमेवं तथा कुर्मि यथा लघ्वी भविष्यसि ॥ ४४ ॥ भगवान् विष्णु बोले— वसुधे! तू भारसे पीड़ित है; किंतु अब उसके लिये भय न कर। मैं अभी ऐसा उपाय करता हूँ जिससे तू हलकी हो जायगी ॥ ४४ ॥

लोमश उवाच स तां विसर्जयित्वा तु वसुधां शैलकुण्डलाम् । ततो वराहः संवृत्त एकशृङ्गो महाद्युतिः ॥ ४५ ॥ लोमशजी कहते हैं— युधिष्ठिर! पर्वतरूपी कुण्डलोंसे विभूषित वसुधादेवीको विदा करके महातेजस्वी भगवान् विष्णुने वाराहका रूप धारण कर लिया। उस समय उनके एक ही दाँत था, जो पर्वत-शिखरके समान सुशोभित होता था ॥ ४५ ॥ रक्ताभ्यां नयनाभ्यां तु भयमुत्पादयन्निव । धूमं च ज्वलयँल्लक्ष्म्या तत्र देशे व्यवर्धत ॥ ४६ ॥ वे अपने लाल-लाल नेत्रोंसे मानो भय उत्पन्न कर रहे थे और अपनी अंगकान्तिसे धूम प्रकट करते हुए उस स्थानपर बढ़ने लगे ॥ ४६ ॥ स गृहीत्वा वसुमतीं शृङ्गेणैकेन भास्वता । योजनानां शतं वीर समुद्धरति सोऽक्षरः ॥ ४७ ॥ वीर युधिष्ठिर! अविनाशी भगवान् विष्णुने अपने एक ही तेजस्वी दाँतके द्वारा पृथ्वीको थामकर उसे सौ योजन ऊपर उठा दिया ॥ ४७ ॥ तस्यां चोद्धार्यमाणायां संक्षोभः समजायत । देवाः संक्षुभिताः सर्वे ऋषयश्च तपोधनाः ॥ ४८ ॥