महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपृथ्वीको उठाते समय सब ओर भारी हलचल मच गयी। सम्पूर्ण देवता तथा तपस्वी ऋषि क्षुब्ध हो उठे ।। हाहाभूतमभूत् सर्वं त्रिदिवं व्योम भूस्तथा । न पर्यवस्थितः कश्चिद् देवो वा मानुषोऽपि वा ।। ४९ ।। ततो ब्रह्माणमासीनं ज्वलमानमिव श्रिया । देवाः सर्षिगणाश्चैव उपतस्थुरनेकणः ।। ५० ।। स्वर्ग, अन्तरिक्ष तथा भूलोक सबमें अत्यन्त हाहाकार मच गया। कोई भी देवता या मनुष्य स्थिर नहीं रह सका। तब अनेक देवता और ऋषि ब्रह्माजीके समीप गये। उस समय वे अपने आसनपर बैठकर दिव्य कान्तिसे प्रकाशित हो रहे थे ।। ४९-५० ।। उपसर्प्य च देवेशं ब्रह्माणं लोकसाक्षिकम् । भूत्वा प्राञ्जलयः सर्वे वाक्यमुच्चारयंस्तदा ।। ५१ ।। लोकसाक्षी देवेश्वर ब्रह्माके निकट पहुँचकर सबने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कहा— ।। ५१ ।। लोकाः संक्षुभिताः सर्वे व्याकुलं च चराचरम् । समुद्राणां च संक्षोभस्त्रिदशेश प्रकाशते ।। ५२ ।। ‘देवेश्वर! सम्पूर्ण लोकोंमें हलचल मच गयी है। चर और अचर सभी प्राणी व्याकुल हैं। समुद्रोंमें बड़ा भारी क्षोभ दिखायी दे रहा है ।। ५२ ।। सैषा वसुमती कृत्स्ना योजनानां शतं गता । किमेतद् किं प्रभावेण येनेदं व्याकुलं जगत् । अख्यातु नो भवान् शीघ्रं विसंज्ञाः स्मेह सर्वशः ।। ५३ ।। ‘यह सारी पृथ्वी सैकड़ों योजन नीचे चली गयी थी, अब यह किसके प्रभावसे कौन-सी अद्भुत घटना घटित हो रही है जिससे सारा संसार व्याकुल हो उठा है। आप शीघ्र हमें इसका कारण बताइये। हम सब लोग अचेत-से हो रहे हैं’ ।। ५३ ।।
ब्रह्मोवाच
असुरेभ्यो भयं नास्ति युष्माकं कुत्रचित् क्वचित् । श्रूयतां यत्कृतेष्वेष संक्षोभो जायतेऽमराः ।। ५४ ।। योऽसौ सर्वत्रगः श्रीमानक्षरात्मा व्यवस्थितः। तस्य प्रभावात् संक्षोभस्त्रिदिवस्य प्रकाशते ।। ५५ ।। ब्रह्माजीने कहा—देवताओ! तुम्हें असुरोंसे कभी और कोई भय नहीं है। यह जो चारों ओर क्षोभ फैल रहा है, इसका क्या कारण है? वह सुनो। वे जो सर्वव्यापी अक्षरस्वरूप श्रीमान् भगवान् नारायण हैं, उन्हींके प्रभावसे यह स्वर्गलोकमें क्षोभ प्रकट हो रहा है ।। ५४-५५ ।।