भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 969

यैषा वसुमती कृत्स्ना योजनानां शतं गता । समुद्धृता पुनस्तेन विष्णुना परमात्मना ॥ ५६ ॥ यह सारी पृथ्वी, जो सैकड़ों योजन नीचे चली गयी थी, इसे परमात्मा श्रीविष्णुने पुनः ऊपर उठाया है ॥ ५६ ॥

तस्यामुद्धार्यमाणायां संक्षोभः समजायत । एवं भवन्तो जानन्तु छिद्यतां संशयश्च वः ॥ ५७ ॥ इस पृथ्वीका उद्धार करते समय ही सब ओर यह महान् क्षोभ प्रकट हुआ है। इस प्रकार तुम्हें इस विश्वव्यापी हलचलका यथार्थ कारण ज्ञात होना और तुम्हारा आन्तरिक संशय दूर हो जाना चाहिये ॥ ५७ ॥

देवा ऊचुः क्व तद् भूतं वसुमतीं समुद्धरति हृष्टवत् । तं देशं भगवन् ब्रूहि तत्र यास्यामहे वयम् ॥ ५८ ॥ देवता बोले—भगवन्! वे वाराहरूपधारी भगवान् प्रसन्न-से होकर कहाँ पृथ्वीका उद्धार कर रहे हैं, उस प्रदेशका पता हमें बताइये; हम सब लोग वहाँ जायेंगे ॥ ५८ ॥

ब्रह्मोवाच हन्त गच्छत भद्रं वो नन्दने पश्यत स्थितम् । एषोऽत्र भगवान् श्रीमान् सुपर्णः सम्प्रकाशते ॥ ५९ ॥ वाराहेणैव रूपेण भगवाँल्लोकभावनः । कालानल इवाभाति पृथिवीतलमुद्धरन् ॥ ६० ॥ ब्रह्माजीने कहा—देवताओ! बड़े हर्षकी बात है, जाओ। तुम्हारा कल्याण हो। भगवान् नन्दनवनमें विराजमान हैं। वहीं उनका दर्शन करो। उस वनके निकट ये स्वर्णके समान सुन्दर रोमवाले परम कान्तिमान् विश्वभावन भगवान् श्रीविष्णु वाराहरूपसे प्रकाशित हो रहे हैं। भूतलका उद्धार करते हुए वे प्रलयकालीन अग्निके समान उद्भासित होते हैं ॥ ५९-६० ॥

एतस्योरसि सुव्यक्तं श्रीवत्समभिराजते । पश्यध्वं विबुधाः सर्वे भूतमेतदनामयम् ॥ ६१ ॥ इनके वक्षःस्थलमें स्पष्टरूपसे श्रीवत्सचिह्न प्रकाशित हो रहा है। देवताओ! ये रोग-शोकसे रहित साक्षात् भगवान् ही वाराहरूपसे प्रकट हुए हैं, तुम सब लोग इनका दर्शन करो ॥ ६१ ॥

लोमश उवाच ततो दृष्ट्वा महात्मानं श्रुत्वा चामन्त्र्य चामराः ।