महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 972, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रविशत्स्वथ वीरेषु पर्वत॑ गन्धमादनम् । चण्डवातं महद् वर्षं प्रादुरासीद् विशाम्पते ॥ ७ ॥ राजन्! वीर पाण्डवोंके गन्धमादन पर्वतपर पदार्पण करते ही प्रचण्ड आँधीके साथ बड़े जोरकी वर्षा होने लगी ॥ ७ ॥
ततो रेणुः समुद्भूतः सपत्रबहुलो महान् । पृथिवीं चान्तरिक्षं च द्यां चैव सहसाऽऽवृणोत् ॥ ८ ॥ फिर धूल और पत्तोंसे भरा हुआ बड़ा भारी बवंडर (आँधी) उठा, जिसने पृथ्वी, अन्तरिक्ष तथा स्वर्गको भी सहसा आच्छादित कर दिया ॥ ८ ॥
न स्म प्रज्ञायते किंचिदावृते व्योम्नि रेणुना । न चापि शेकुस्तत् कर्तुमन्योन्यस्याभिभाषणम् ॥ ९ ॥ न चापश्यंस्ततोऽन्योन्यं तमसावृतचक्षुषः । आकृष्यमाणा वातेन साश्मचूर्णेन भारत ॥ १० ॥ धूलसे आकाशके ढक जानेसे कुछ भी सूझ नहीं पड़ता था; इसलिये वे एक-दूसरेसे बातचीत भी नहीं कर पाते थे। अन्धकारने आँखोंपर पर्दा डाल दिया था; जिससे पाण्डवलोग एक-दूसरेके दर्शनसे भी वञ्चित हो गये थे। भारत! पत्थरोंका चूर्ण बिखेरती हुई वायु उन्हें कहीं-से-कहीं खींच लिये जाती थी ॥ ९-१० ॥
द्रुमाणां वातभग्नानां पततां भूतलेऽनिशम् । अन्येषां च महीजानां शब्दः समभवन्महान् ॥ ११ ॥ प्रचण्ड वायुके वेगसे टूटकर निरन्तर धरतीपर गिरनेवाले वृक्षों तथा अन्य झाड़ोंका भयंकर शब्द सुनायी पड़ता था ॥ ११ ॥
द्यौः स्वित् पतति किं भूमिर्दीर्यते पर्वतो नु किम् । इति ते मेनिरे सर्वे पवनेनापि मोहिताः ॥ १२ ॥ हवाके झोंकेसे मोहित होकर वे सब-के-सब मन-ही-मन सोचने लगे कि आकाश तो नहीं फट पड़ा है। पृथ्वी तो नहीं विदीर्ण हो रही है अथवा कोई पर्वत तो नहीं फटा जा रहा है ॥ १२ ॥
ते पथानन्तरान् वृक्षान् वल्मीकान् विषमाणि च । पाणिभिः परिमार्गन्तो भीता वायोर्निलिल्यिरे ॥ १३ ॥ तत्पश्चात् वे रास्तेके आस-पासके वृक्षों, मिट्टीके ढेरों और ऊँचे-नीचे स्थानोंको हाथोंसे टटोलते हुए हवासे डरकर यत्र-तत्र छिपने लगे ॥ १३ ॥
ततः कार्मुकमादाय भीमसेनो महाबलः । कृष्णामादाय संगम्य तस्थावाश्रित्य पादपम् ॥ १४ ॥ उस समय महाबली भीमसेन हाथमें धनुष लिये द्रौपदीको अपने साथ रखकर एक वृक्षके सहारे खड़े हो गये ॥ १४ ॥