भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 973, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 973

धर्मराजश्च धौम्यश्च निलिल्येते महावने । अग्निहोत्राण्युपादाय सहदेवस्तु पर्वते ॥ १५ ॥ धर्मराज युधिष्ठिर और पुरोहित धौम्य अग्निहोत्रकी सामग्री लिये उस महान् वनमें कहीं जा छिपे। सहदेव पर्वतपर ही (कहीं सुरक्षित स्थानमें) छिप गये ॥ १५ ॥

नकुलो ब्राह्मणांश्चान्ये लोमशश्च महातपाः । वृक्षानासाद्य संत्रस्तास्तत्र तत्र निलिल्यिरे ॥ १६ ॥ नकुल, अन्यान्य ब्राह्मणलोग तथा महातपस्वी लोमशजी भी भयभीत होकर जहाँ-तहाँ वृक्षोंकी आड़ लेकर छिपे रहे ॥ १६ ॥

मन्दीभूते तु पवने तस्मिन् रजसि शाम्यति । महद्भिर्जलधारौघैर्वर्षमभ्याजगाम ह ॥ १७ ॥ भृशं चटचटाशब्दो वज्राणां क्षिप्यतामिव । ततस्ताश्चञ्चलाभासश्चेरुरभ्रेषु विद्युततः ॥ १८ ॥ थोड़ी देरमें जब वायुका वेग कुछ कम हुआ और धूल उड़नी बंद हो गयी, उस समय बड़ी भारी जलधारा बरसने लगी। तदनन्तर वज्रपातके समान मेघोंकी गड़गड़ाहट होने लगी और मेघमालाओंमें चारों ओर चंचल चमकवाली बिजलियाँ संचरण करने लगीं ॥ १७-१८ ॥

ततोऽश्मसहिता धाराः संवृण्वन्त्यः समन्ततः । प्रपेतुरनिशं तत्र शीघ्रवातसमीरिताः ॥ १९ ॥ तत्पश्चात् तीव्र वायुसे प्रेरित हो समस्त दिशाओंको आच्छादित करती हुई ओलोंसहित जलकी धाराएँ अविराम गतिसे गिरने लगीं ॥ १९ ॥

तत्र सागरगा ह्यापः कीर्यमाणाः समन्ततः । प्रादुरासन् सकलुषाः फेनवत्यो विशाम्पते ॥ २० ॥ महाराज! वहाँ चारों ओर बिखरी हुई जलराशि समुद्रगामिनी नदियोंके रूपमें प्रकट हो गयी जो मिट्टी मिल जानेसे मलिन दीख पड़ती थी। उसमें झाग उठ रहे थे ॥ २० ॥

वहन्त्यो वारि बहुलं फेनोडुपपरिप्लुतम् । परिसस्रुर्महाशब्दाः प्रकर्षन्त्यो महीरुहान् ॥ २१ ॥ फेनरूपी नौकासे व्याप्त अगाध जलसमूहको बहाती हुई सरिताएँ टूटकर गिरे हुए वृक्षोंको अपनी लहरोंसे समेटकर जोर-जोरसे 'हर-हर' ध्वनि करती हुई बह रही थीं ॥ २१ ॥

तस्मिन्नुपरते शब्दे वाते च समतां गते । गते ह्यम्भसि निम्नानि प्रादुर्भूते दिवाकरे ॥ २२ ॥ निर्जग्मुस्ते शनैः सर्वे समाजग्मुश्च भारत । प्रतस्थिरे पुनर्वीराः पर्वतं गन्धमादनम् ॥ २३ ॥

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